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बुधवार, 28 मई 2008

आरक्षण की आग


29 मई 2008
राजस्थान से उठी आग की आंच अब देश की राजधानी समेत दूसरे हिस्सों में भी साफ महसूस की जा सकती है। खुद को अनुसूचित जाति का दर्जा देने को लेकर गुर्जरों ने जो आंदोलन राजस्थान में छेड़ा था वो अब व्यापक रूप ले चुका है। गुर्जरों ने राजधानी दिल्ली और एनसीआर में बंद का आह्वान कर तमाम रास्तों पर जाम लगा रखा है, कई महत्वपूर्ण ट्रेनें रोक दी गई हैं और बुनियादी ज़रूरतों वाली चीजों की आपूर्ति ठप कर दी गई है। कह सकते हैं कि जनजाति में आरक्षण की सुलगती भट्टी की लपटें अब आम आदमी को झुलसाने लगी है। समस्या पेचीदिगियों से भरी है,सुलझाने का रास्ता बातचीत की गलियों से होकर ही गुजरता है लेकिन उसका भी अभाव दिख रहा है। एक मंच पर आकर आम राय बनाते हुए अमन और शांति की बहाली के प्रयास के बजाए अभी भी राजनीतिक दल इसकी टोपी उसके सर वाला खेल खेलती नजर आ रही हैं। जिस तरह चुनावी राजनीति के तहत गुर्जरों को आरक्षण की हवा में बहाया गया था,आज भी लगभग वही प्रक्रिया सरकार द्वारा अपनाई जा रही है। गुर्जरों की मांग के अनुरूप प्रधानमंत्री को भेजे पत्र द्वारा यही स्थापित किया जा रहा है कि उनकी मांगों पर अब केंद्र को निर्णय लेना है लेकिन सभी जानते हैं कि इसकी एक पूरी संवैधानिक प्रक्रिया है और इसके तहत राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की सिफारिश सबसे जरूरी और पहला कदम है। हालांकि इस दिशा में भी राजस्थान सरकार की तरफ से कोई पहल अभी तक तो नहीं हुई है। गौर से देखें तो राजस्थान में आरक्षण को लेकर गुर्जरों में पनपे असंतोष की पृष्ठभूमि में अवसरों से वंचित होने का अहसास तो है ही,साथ ही जनजाति में न आने के कारण राजनीतिक ताकत का लगातार छीजते चले जाना भी है। पूरे प्रदेश में एकाध इलाके को छोड़ दें तो बाकी राज्यभर में शैक्षिक व आर्थिक रूप से गुर्जरों की कोई बेहतर स्थिति नहीं बनी है,जबकि उनके समकक्ष अन्य कई जातियों ने अनुसूचित जनजाति का दर्जा पाने के बाद शिक्षा व नौकरियों के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलताएं हासिल की हैं,जिससे उनका आर्थिक स्तर भी बढ़ा है शायद यही कारण है कि यह मामला इतना जटिल होकर सामने आया है। ये स्थिति अभी औऱ विकट हो सकती है क्योंकि अनुसूचित जनजाति आयोग के सूत्रों की मानें तो करीब 1000 जातियों ने अर्जी दी है कि उन्हें जनजाति का दर्जा दिया जाए। उधर गुर्जरों के हितों की लड़ाई लड़ने के लिए गुर्जर नेता किरोड़ी सिंह बैंसला ने दलीय राजनीति में कूदने का मन बना लिया है। वह गुर्जरों को गोलबंद कर राजनीतिक दल का गठन करने की तैयारी कर रहे हैं। सामाजिक हक की लड़ाई अब राजनीतिक गलियारों में पहुंच चुकी है और अब लोग इस लड़ाई के दौरान मारे गए लोगों की लाशों पर अपना राजनीतिक मुकाम बनाने की संभावनाएं भी तलाशने लगे हैं। कहना गलत न होगा कि अगर आरक्षण की व्यवस्था को समय रहते तर्कसंगत नहीं बनाया गया तो जिस अर्थव्यवस्था को दुनिया के बराबर ले जाने की कोशिशें हो रही हैं,वह उल्टी दिशा में बहने लगे तो कोई आश्चर्य नहीं होगा।

post by-
anil kumar verma

मां को मिला न्याय


29 मई 2008
नीतीश कटारा हत्याकांड में दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने बुधवार को आपना फैसला सुनाया। बाहुबली सांसद डीपी यादव के बेटे और मामले के दोनों मुख्य अभियुक्तों विकास औऱ विशाल यादव को अदालत ने दोषी करार देते हुए सजा सुनाने के लिए तीस मई का दिन मुकर्रर किया। इस फैसले ने एक बार फिर न्यायपालिका में आम आदमी के भरोसे को और पुख्ता किया। इस हाईप्रोफाइल मामले से जिस तरह से रसूखदार लोगों के नाम जुड़े थे और जिस तरह से सुनवाई के दौरान न्याय प्रक्रिया को बाधित करने की कोशिशें हुईं उससे पीड़ित पक्ष को न्याय मिलने को लेकर मन थोड़ा आशंकित था लेकिन एक मां की लड़ाई रंग लाई और उसके बेटे को न्याय मिला। छह साल की लंबी और थका देने वाली अदालती प्रक्रिया पर एक मां का साहस भारी पड़ा। अपने जिगर के टुकड़े को न्याय दिलाने की एक मां की द्रढ़ इच्छा शक्ति ने एक बार फिर स्थापित कर दिया कि मां की ममता से ताकतवर इस दुनिया में कुछ भी नहीं। इस मामले में जिस तरह से एक बाहुबली सांसद के बेटों की भागीदारी सामने आ रही थी तो ये बात तो साफ थी कि केस को कमजोर करने की कोशिशें होंगी औऱ हुई भीं,जिस महिला मित्र के चलते नीतीश को अपनी जान गंवानी पड़ी उसका शुरूआती बयानों से मुकरना,जिस शख्स ने अभियुक्तों के साथ आखिरी बार नीतीश को देखने का दावा किया उसका अपने दावे से पलटना,गवाहों को डराने धमकाने की कोशिशों के बीच न्याय की खातिर लड़ी जा रही एक मां की जंग आसान नहीं थी लेकिन जिस तरह से नीतीश कटारा की मां नीलम कटारा मामले की हर सुनवाई के दौरान खुद कोर्ट में मौजूद रहीं वो अपने बेटे को न्याय दिलाने की उनकी जिजीविषा को दर्शाता है। तमाम चुनौतियों के बीच न्याय की ये जंग अपने अंजाम तक पहुंची तो इसके लिए न्यायपालिका और मीडिया के साथ साथ हर वो शख्स साधुवाद का पात्र है जो इस मां की लड़ाई में उसके साथ खड़ा था। यूं तो मां की ममता और उसकी महिमा को शब्दों में नहीं बांधा जा सकता लेकिन फिर भी किसी कवि ह्रदय से निकली ये पंक्तियां यहां ज़रूर लिखना चाहूंगा-

मां धरती से अधिक धैर्यवान

सागर से भी गहरी

हिमालय से बडी

और

सूरज से भी अधिक

ऊर्जामयी होती है

मां धरती की तरह दरकती तो है

पर

अपनी संतानों को नहीं लीलती

जैसे

भूमि ने अपने आपमें

समाहित कर लिया था भूमिजा को।

मां हिमालय से ऊंचे कद

बडे पद की होती हैं पर

उसकी तरह कठोर नहीं होती

संवेदना पर

पानी की एक बूंद भी गिरे तो

थरथरा जाती हैं मां

बर्फ सी गलने लगती है मां

आंधियों सी चलने लगती है मां

मां सूरज भी है और

उसकी अनंत अक्षुण्य ऊर्जा भी

पर

उसकी तरह

दिन रात खटने के बाद भी नहीं थकती

चिडियों की चहचहाहट हो

या बच्चों की किलकारियां

मां कभी नहीं ऊबती

एक बार उग जाए तो कभी नहीं डूबती।

मां एक रिश्ता है, संस्कार है

मां ही सृष्टि है, संसार है

मां सृजन है, साकार है

मां तृप्ति है, मनुहार है

मां सिर्फ मां नहीं, त्योहार है

ममता का बीज, क्षमता का पेड

समता का फल

और समरसता का संसार है

मां गति है, प्रगति है, प्रकृति है, पालनहार है

मां ग्रीष्म नहीं, सावन की फुहार है

मां सनातन है, सिद्ध है, सृजनहार है

मां प्रेम है, प्रमाण है, पुरस्कार है

मां दर्द की साक्षात अवतार है।

अंत में एक मां की ममता को एक बार फिर सादर नमन।

post by-
anil kumar verma

रविवार, 25 मई 2008

सामाजिक बंटवारे की सियासत


26 मई 2008
राज ठाकरे ने एक बार फिर उत्तर भारतीयों को लेकर अपना इंफीरियारिटी कांप्लेक्स बेतुके और अमर्यादित शब्दों के माध्यम से जग जाहिर किया है। यूं तो राज की इन हरकतों को लेकर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। बहुत से लोगों ने उन्हें देश के सामाजिक ढांचे को बिगाड़ने के लिए जिम्मेदार बताकर कठघरे में भी खड़ा किया लेकिन मैं ऐसा करने में पीछे रह गया। दरअसल इससे पहले राज ने जब भी कुछ कहा उस वक्त तक मैं ब्लॉग जैसे हथियार के इस्तेमाल से वाकिफ नहीं था। अब जबकि ऐसा हो चुका है तो मेरा मन भी राज की अगड़म बगड़म पर अपने विचारों को पेश करने के लिए मचल रहा है। राज बार बार ये कहते आ रहे हैं कि उत्तर भारतीयों ने मराठी मानुषों के रोजगार पर कब्जा कर लिया है, उनकी नौकरियों को हथिया लिया है, जिससे उनके सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया है। इतना ही नहीं उन्होंने उत्तर भारतीयों द्वारा अपने त्योहार मनाए जाने को भी गुंडा गर्दी करार दिया और ऐसा करने पर परिणाम भुगतने की चेतावनी दे डाली। दरअसल शिवसेना से नाता टूटने के बाद अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे राज को शायद इससे बेहतर कोई रास्ता नहीं सूझा और उन्होंने शिव सेना द्वारा दफन की जा चुकी उसी चिंगारी को हवा देना शुरू किया जिसमें न के बराबर आंच बची थी। इसी चिंगारी में उन्हें अपना राजनीतिक करियर परवाज भरता नजर आ रहा था क्योंकि मुबंई में बड़ी संख्या में उत्तर भारतीय बसे हैं। उन्हें टारगेट करना मतलब देश के दो ऐसे बड़े राज्यों पर निशाना साधना जहां से केंद्रीय सत्ता की दशा-दिशा तय होती है। राज ये बाखूबी जानते थे कि जब मुंबई में बसे इस वर्ग पर चोट की जाएगी तो वे केवल मुंबई की ही नहीं बल्कि भारतीय राजनीति की मुख्यधारा में शामिल हो जायेंगे। वे जानते हैं कि इस देश में सबसे आसान काम है किसी की भी भावना से खेलना सो उन्होंने उत्तर भारतीयों के माध्यम से मराठी मानुष की भावनाओं को भड़काया। उन्हें आपला मानुस और भैया में फर्क समझाना शुरू किया और उन्हें ये समझाने की कोशिश की कि भैया लोग उनके अस्तित्व के लिए खतरा बन रहे हैं। वरना साधनहीन, मेहनतकश उत्तर भारतीय ‘भैया’ लोग जो झुग्गियों में अत्यल्प साधनों के बीच रहते हैं, उनसे, राज ठाकरे जैसे नेताओं और आपले शहर में रहने वाले मराठियों का अस्तित्व किस तरह खतरे में पड़ गया ये मेरी ही नहीं मुंबई वासियों की समझ से भी परे था। राज को ये कौन समझाए कि जितने भी उत्तर भारतीय उनकी नजर में मराठियों के लिए खतरा हैं, जब वे मुबंई आए थे तो सपनों के इस शहर ने उनकी हर तरह से परीक्षा ली थी। उत्तर भारतीय जहां भी जमे हैं, अपने जीवट और मेहनत से जमे हैं। मुंबई ने उनके साथ कोई रियायत नहीं की। इतनी साधनहीन जिंदगी जीकर अगर उत्तर भारतीय किसी दूसरे प्रदेश में जाकर इतने महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि किसी के अस्तित्व के लिए खतरा बन जाएं तो किसी को भी उनके अस्तित्व पर गर्व होना चाहिए। ऐसे में जो लोग इसे अपने देश, अपने शहर में रहते हुए अपनी अस्मिता को संकट में मानने लगे हैं, उनके जीवट पर शंका होनी लाजिमी है। राज ठाकरे को शुक्रगुजार होना चाहिए कि ये इस देश का लोकतंत्र ही है जिसने उन जैसे असहिष्णु, अपरिपक्व, असंवेदनशील व्यक्ति को भी राज करने का सपना देखने और उसे किसी भी रास्ते से पूरा करने की स्वच्छंदता दी है। जिसके चलते वो अब तक सार्वजनिक मंच से बकर-बकर कर पा रहे हैं वरना तो अब तक सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने और हिंसा का माहौल पैदा करने के चलते उन्हें नजरबंद कर दिया गया होता। जिस तरह से उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने पिछले दिनों महाराष्ट्र में उत्पात मचाया उसके बाद तो पूरे उत्तर भारत को उन पर हमला बोल देना चाहिए था लेकिन ये उत्तर भारतीयों की सहिष्णुता और संवेदनशीलता ही है जो उनका भरोसा अब तक कानून में कायम है। उन्हें लगता है कि राज को उनके किए की सजा कानून ज़रूर देगा। ये अलग बात है कि राज्य की सरकार भी इस मामले को राजनीतिक चश्मे से ही देख रही है और वोटबैंक के चक्कर में कड़ी कारर्वाई करने से बचती आ रही है। मैं अपने ब्लॉग के माध्यम से राज ठाकरे से ये कहना चाहूंगा कि अगर देश के विकास और भलाई के लिए कुछ नहीं कर सकते तो कम से कम देश को बांटने की राह पर भी न चलें। वैसे भी हमारे वतन में अमन चैन की राह में तमाम दुश्मन पहले से मौजूद हैं। अंत में किसी कवि ह्रदय से निकली कुछ पंक्तियां कहना चाहूंगा -

पराये हैं,
ये तो मालूम था हमको
जो अब कह ही दिया तूने
तो आया सुकूं दिल को

शराफत के उन सारे कहकहों में
शोर था इतना
मेरी आवाज़ ही पहचान
में न आ रही मुझको

बिखेरे क्यों कोई अब
प्यार की खुशबू फिज़ाओं में
शक की चादरों में दिखती
हर शय यहाँ सबको

बढ़ाओं आग नफ़रत की
जगह भी और है यारों
दिलों की भट्टियों में
सियासत को ज़रा सेको

सड़क पे आ के अक्सर
चुप्पियाँ दम तोड़ देती हैं
बस इतनी खता पे
पत्थर तो न फेंकों

post by-
anil kumar verma
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