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मंगलवार, 26 अगस्त 2008

बिहार में लहरों का कहर

27 अगस्त 2008
बिहार एक बार फिर बाढ़ की चपेट में है। राज्य के मधेपुरा, अररिया, सुपौल और सहरसा ज़िलों में कोसी नदी की लहरें कहन बनकर विनाशलीला कर रही है। नदी का तटबंध टूटने से लगभग 25 लाख लोग प्रभावित हुए हैं। अब तक लगभग 40 लोगों की मौत हो चुकी है लेकिन जानमाल की क्षति का सही आकलन बाढ़ के उफान के थमने के बाद ही हो सकेगा। बाढ़ के कारण हज़ारों हेक्टेयर भूमि पर खड़ी फसलों को नुकसान पहुँचा है।



लोग भूखे और बेघर होकर सरकारी मदद की आस में जी रहे हैं। मदद दी जा रही है लेकिन शायद नाकाफी है। बचाव कार्य के लिए 200 कश्तियाँ और 25 मोटर वाली नावें इस्मेताल की जा रही हैं। प्रभावित इलाक़ों तक खाने के पैकेट पहुँचाने के लिए तीन हेलीकॉप्टरों की मदद ली गई है। बाढ़ की चपेट में आए एक तिहाई बिहार को फौरी राहत पहुंचाने के लिए मुझे तो ये मदद नाकाफी ही लगती है। जिस तरह से बाढ़ की त्रासदी की शिकार जनता हेलीकॉप्टरों की गड़गड़ाहट सुन राहत सामग्री के लिए दौड़ लगाती है वो दिल को दर्द ही देती है। चूड़ा,गुड़,दिया-सलाई, मोमबत्ती,नमक और सत्तू के लिए लोग जी-जान लगा देते हैं। हेलीकॉप्टर के पीछे भागते वक्त न चोट की परवाह न दर्द की। किसी भी तरह से एक पैकेट हासिल करना होता है। जिससे परिवार के पेट की आग शान्त की जा सके। लहरों के इस कहर के बीच भूल जाइए..बीमारों को..लाचारों को...जो ज़िंदा हैं...खड़े हैं उन तक भी राहत पहुंचाना कोई आसान काम नहीं।







तबाही का ये मंजर हर साल ऐसा ही होता है। हर बार हजारों करोड रुपए बाढ़ राहत के नाम पर खर्च कर दिए जाते हैं लेकिन राहत मिलती नजर नहीं आती। इसी वर्ष जनवरी महीने में पटना में अनिवासी भारतीयों के एक सम्मेलन को संबोधित किया था। इस सम्मेलन में कलाम साहब ने उम्मीद जताई थी कि 2015 तक बिहार राज्य को देश के सबसे विकसित राज्य के रूप में पहचाना जाएगा। तत्कालीन राष्ट्रपति महोदय यह भी कह चुके हैं कि हरित क्रांति की शुरुआत अब बिहार राज्य से किए जाने की ज़रूरत है। प्रश् यह है कि क्या बाढ़ में डूबे हुए बिहार को देखकर इस बात की कल्पना भी की जा सकती है कि यही राज्य वह राज्य है जिसके बारे में भारत के महान स्वप्नदर्शी राष्ट्रपति ने देश के सबसे विकसित राज्य बनाए जाने का सपना देख रखा था? क्या इस प्रलयकारी बाढ़ के दृश्य देखने के पश्चात किसी अनिवासी भारतीय व्यवसायी से यह उम्मीद की जा सकती है कि वह ऐसी प्राकृतिक विपदाओं को देखने के बावजूद बिहार में पूंजी निवेश भी करेगा।









मैनें हिन्द युग्म ब्लाग पर भूपेन्द्र राघव जी की एक कविता पढी थी जिसका जिक्र यहां करना चाहूंगा......

जीवन दायी देखो कैसा जीवन ग्राही बन गया,
लहर लहर बन गयी कहर, एक तबाही बन गया

बह गये सब खेत मवेशी, खोर लवारे बह गये,
बह गये सब चौका चूल्हे, घर उसारे तक बह गये,
जल में डूबा छितिज छोर, जाने कहाँ से उफन गया
जीवन दायी देखो कैसा जीवन ग्राही बन गया...

टूट गयीं सब सडकें पुल पथ, टूट गये सब पेड़ रूख,
आंतें टूटी बहुत अबोध हाय! सह न सकीं जो विकट भूख,
कितनों की सिन्दूर चूड़ियाँ, कितनों का यौवन गया,
जीवन दायी देखो कैसा जीवन ग्राही बन गया।



सभी फोटो साभार बीबीसी

मंगलवार, 29 जुलाई 2008

दहशत में देश

30 जुलाई 2008



बैंगलुरु और और अहमदाबाद में हुए धमाकों की दहशत लोगों के ज़ेहन से अभी हटी भी नहीं थी कि गुजरात का एक और शहर आतंक के साए में डूबा नजर आया। गुजरात की व्यवसायिक राजधानी सूरत में एक के बाद एक 18 बम बरामद हुए। हालांकि बम निरोधक दस्ते ने सभी बमों को निष्क्रिय कर दिया लेकिन इस बात का अंदाजा लगाना कतई मुश्किल नहीं है कि अगर ये बम फट जाते तो हालात कैसे होते। पूरा का पूरा शहर मानों आतंक और दहशत की धुरी पर खड़ा था। इन बमों के विफल होते ही आतंकियों ने फिर से मेल करके जहां अपने मिशन सूरत को फेल होने की बात कबूली वहीं फिर से चेतावनी दे डाली कि वो गुजरात के दूसरे इलाकों में फिर धमाके करेंगे और सरकार में दम हो तो उन्हें रोक के दिखाए। गौर करने वाली बात ये है कि सूरत में जो 18बम मिले थे, उन सभी को स्थानीय नागरिकों ने तलाश किया था और उन्हें पुलिस के बम दस्ते से सिर्फ़ निष्क्रिय किया। मतलब साफ है कि पुख्ता सुरक्षा व्यवस्था का दम भरने वाली सुरक्षा एजेंसियां और पुलिस प्रशासन पंगु हो चुके हैं। एक के बाद एक हो रही आतंकी घटनाओं ने उन्हें अवसाद की स्थिति में ला खड़ा किया है। अब ऐसे में जनता को ये महसूस होने लगा है कि ऐसी भयानक त्रासदियों के बीच जीना ही उसकी नियति बन चुका है। इससे शर्मनाक औऱ क्या हो सकता है कि सूचना और संचार प्रौद्योगिकी की विश्वशक्ति,परमाणु शक्ति से लैस, भविष्य का सबसे युवा और ऊर्जावान देश अपनी जनता के जान माल की रक्षा करने में नाकाम साबित हो रहा है। आतंक, असुरक्षा और बेबसी उसकी पहचान बनता जा रहा है।



हर बार की तरह एक बार फिर इस बार हुए धमाकों का शिकार हुए लोगों के परिजनों के प्रति शोक संवेदानाओं का दौर जारी है, आर्थिक सहायता दी जा रही है, माननीयों के दौरे हो रहे हैं, केंद्र और राज्यों की सुरक्षा एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल की उम्मीदें और दावे किए जा रहे हैं लेकिन इन सबके बीच सत्तारूढ़ दल और विपक्ष के बीच आरोप प्रत्यारोप का दौर भी जारी है। जो ये दर्शाता है कि आतंकवाद के विरुद्ध एक निर्णायक लड़ाई लड़ने का किस कदर अभाव है। जबकि दोषारोपण और असहायता के मनोविज्ञान से बाहर निकले बिना आतंकवाद के विरुद्ध कोई कारगर और निर्णायक लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती।



हिंसा की सीमा ख़त्म हो चुकी है। क्योंकि यह ना उम्र देखती है,ना मज़हब। अस्पतालों को निशाना बना कर यह संकेत भी दे दिया गया कि हिंसा जितना संभव हो उतनी निर्मम शक्ल में होगी। माना कि इतने बड़े देश में हर जगह, हर शख्स को सुरक्षा नहीं दी जा सकती लेकिन क्या अब तक हुए बम धमाकों के बाद हुई जांच पड़ताल और उसके लिए बनी जांच कमेटियों की रिपोर्टो, गिरफ्तार हुए लोगों से हुई पूछताथ और घटनास्थल से मिले सुरागों के बाद क्या कोई ऐसी व्यवस्था विकसित हो पाई है, जिससे दिनों दिन गहराते आतंक के इस काले साए से निपटने में मदद मिल सके। शायद नहीं, क्योंकि ऐसी घटनाओं पर लगाम न लग पाना इसका स्पष्ट सबूत है। मेरे हिसाब से अब वो समय बीत गया है जब हम सुरक्षा एजेंसियों और प्रशासनिक व्यवस्था के भरोसे रहकर जिंदगी को जीने की कोशिश करें। अब वक्त हे हर नागरिक को अपनी हिफाजत के लिए आतंकवादी मंसूबों से लड़ने के लिए उठ खड़े होने का। मानवता-विरोधी, सभ्यता-विरोधी बर्बर लोगों को मार भगाने का जज्बा जब इस देश में रहने वाले हर शख्स के दिल में होगा तभी अमन चैन बहाल होगा और दहशत भरी हवाओं में सांस लेती जिन्दगी को खुली और आजाद हवा नसीब हो सकेगी। लोगों में इस बात के लिए विश्वास जगाना होगा कि देश मजहब और धर्म से बड़ा होता है। जब वो सुरक्षित होगा तो हम सुरक्षित होंगे।

सभी फोटो साभार बीबीसी

शनिवार, 26 जुलाई 2008

आतंकवाद का पसरता साया




27 जुलाई 2008
26 जुलाई यानि शनिवार को गुजरात की औद्योगिक राजधानी अहमदाबाद 70 मिनट के भीतर हुए सोलह धमाकों से थर्राई, बीस से ज्यादा लोगों की मौत और सौ से ज्यादा घायल। इस खबर से जहां सभी अखबार रंगे पड़े हैं तो सारे न्यूज चैनल भी मानों इन्हीं के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गए हैं। इससे ठीक एक दिन पहले शुक्रवार को कर्नाटक की राजधानी बैंगलुरू में हुए नौ घमाकों की आवाज अभी लोगों के कानों में गूंज ही रही थी कि एक और आतंकी हमले ने लोगों को भीतर तक झकझोर कर रख दिया। अभी ज्यादा वक्त नहीं बीता जब जयपुर और हैदराबाद में भी कुछ ऐसा ही नजारा सामने आया था। आतंकियों ने ऐसे ही धमाके कर तमाम लोगों की जानें ले ली थी। अहमदाबाद में जो कुछ हुआ उससे एक बात तो साफ हो गई कि देश में सुरक्षा व्यवस्था के नाम पर कुछ शेष नहीं बचा है। देश का हर नागरिक अपनी जिन्दगी अपनी किस्मत के सहारे जी रहा है। आतंकी आते हैं, छाती ठोंक के, चुनौती देकर, जहां मर्जी होती है बम फोड़कर चले जाते हैं। पीछे छोड़ जाते हैं दहशत, रोते-बिलखते लोग और फिजा में पसरा मौत का सन्नाटा। सुनाई देती है तो केवल बुद्धिजीवियों में आतंकवाद को लेकर छिड़ी बहस, कानों में गूंजती है तो प्रधानमंत्री सहित तमाम नेताओं द्वारा की जा रही बम धमाकों की निन्दा, आरोप-प्रत्यारोप और रेड अलर्ट के साथ हाई अलर्ट का शोर। हर बार यही होता है। कोई हमारे नीति नियंताओं, देश चलाने और संभालने का ठेका लेने वालो और हमें सुरक्षा का भरोसा दिलाने वालों से ये नहीं पूछता कि आखिर इस सब पर लगाम कब लगेगी। खेमों और वर्गों में बंटा हमारा समाज भी अपने अपनों को सही ठहराते हुए दूसरों की कमियां गिनाने में लग जाता है। राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों में विभाजित देश की सौ करोड़ की आबादी उन लोगों से ये सवाल नहीं करती कि आखिर उन परिवारों का क्या कसूर था, जिनके कलेजे के टुकड़े इस आतंक की भेंट चढ़ गए। कोई नहीं पूछता कि कब तक यूं ही आतंकवाद से लड़ने के खोखले दावे किए जाते रहेंगे। सरकार किसी की भी हो धमाके होते हैं, बार बार होते हैं और निर्दोष जनता मारी जाती है। इंसानियत के इन दुश्मनों से निपटने के लिए कहीं कोई आम राय बनती नजर नहीं आती। क्या वजह है कि अमेरिका में 9-11 के बाद कोई आतंकी हमला नहीं हुआ जबकि हम रोज ऐसे हमलों से दो-चार हो रहे हैं। कमी आखिर कहां है। इस समस्या से निपटने के लिए हमारी इच्छा शक्ति में कमी है या फिर संसाधनों में। आखिर क्यों हम आतंकियों के नापाक मंसीबों पर लगाम लगाने में कामयाब नहीं हो पा रहे हैं। प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति द्वारा इस मौके पर भले ही लोगों से शांति बनाए रखने की अपील बेशक लोगों को अमन के लिए आतंक के खिलाफ उभरते जज्बातों को जब्त किए रखने को मजबूर कर रही हो लेकिन हर शख्स के मन में यही सवाल धधक रहा है कि आखिर कब तक। दरअसल पिछले पंद्रह-बीस वर्षों में कुछ वजहों से दुनिया बहुत बदल गई है। ये वजह हैं,संचार क्रांति, इमीग्रेशन, ग्लोबलाइजेशन, ग्लोबल वार्मिंग और आतंकवाद। इनमें से पहली दो चीजों से नक्शे और समाज बदले , तीसरी की मार संस्कृति पर पड़ी और चौथी बात से पूरी पृथ्वी का मुस्तकबिल ही खतरे में पड़ गया लेकिन पांचवी और आखिरी बात से तो पूरी इंसानियत का मुस्तकबिल ही दांव पर लग गया है। दरअसल आतंकवाद की आकांक्षा हमेशा से ही रक्तरंजित और प्रवृत्ति पाश्विक रही है। दहशत पैदा करने और फैलाने के लिए उसने नित नयी भाव भंगिमाएं गढ़ीं। विध्वंस, आतंकवाद की पहली शर्त रहा है और वो इसी शर्त का पालने करने में लगे हैं लेकिन आतंकवाद से लड़ने के लिए हमने ऐसी कोई शर्त नहीं बनाई और शायद यही वजह है कि हम इस राक्षस से लड़ने में नाकाम हो रहे हैं।

मंगलवार, 22 जुलाई 2008

बीमारू राजनीति

23 जुलाई 2008
22 जुलाई, दिन मंगलवार, भारतीय लोकतंत्र के प्रतीक संसद भवन में गहमागहमी चरम पर थी। यूं तो देश में राजनीतिक पारा तभी से चढ़ने लगा था जब केंद्र की यूपीए सरकार को समर्थन दे रहे वाम दलों ने उससे किनारा कर लिया। वजह बताई गई अमेरिका के साथ होने वाला परमाणु करार। शब्दों के तरकश से आरोपों के तीर चलने शुरू हो चुके थे। गलबहियां कर संसद के गलियारों में चहलकदमी करने वाले अब एक दूसरे से कन्नी काटने लगे थे। सबको साथ लेकर चलने के दावे कहीं पीछे छूट गए थे। कांग्रेस और दूसरे घटक दल तो शांत थे लेकिन वामदल आग उगल रहे थे। वो किसी भी कीमत पर सरकार को सत्ता से बाहर करना चाहते थे लेकिन ऐसा वे अपने दम पर नहीं कर सकते थे लिहाजा नजरें दौड़ाकर कुछ दूसरे मतलब के यार तलाशने की कवायद की गई। तलाश पूरी हुई और यूएनपीए के साथ साथ उत्तर प्रदेश में सत्तासीन मायावती की बसपा को साथ लेकर वामदलों ने युद्ध का बिगुल फूंक दिया। उधर विपक्ष में बैठे एनडीए को भी लगा कि वो शायद यूपूए सरकार की फजीहत करने में कामयाब हो जाएगी। लिहाजा उसने भी अपने अस्त्र-शस्त्र संभालने शुरू कर दिए। कांग्रेस ने हर हाल में डील करने का फैसला किया फिर चाहे सरकार रहे या चली जाए। युवराज राहुल गांधी भी अमेठी में दहाड़े कि देश पहले है सरकार बाद में। इस बीच यूपीए के लिए राहत वाली बात ये रही कि समाजवादी पार्टी उसके साथ आ खड़ी हुई। पर्दे के पीछे उसकी कांग्रेस के साथ क्या खिचड़ी पकी ये तो आने वाले समय में ही साफ होगा लेकिन मुलायम सिंह सरकार के लिए संकटमोचक बनकर सामने आ खड़े हुए। झामुमो नेता शिबू सोरेन ने भी बहती गंगा में हाथ धोने से गुरेज नहीं किया और अपनी शर्तों पर वे भी सरकार के साथ देने के लिए राजी हो गए। दागी और जेल की हवा खा रहे सांसदों का भी भाव बढ़ गया । जनता के प्रतिनिधि बाजार में बिकने के लिए तैयार दिखाई दिए। सभी अपनी अपनी गोटियां फिट करने में लग गए। सरकार को अपने सांसदों को अपने पाले में रखने के साथ साथ ऐसे लोगों की भी तलाश थी जो संसद में उसकी स्थिति मजबूत कर सकें तो विपक्ष के सामने भी ये चुनौती थी कि वो अपने सांसदों को पाला बदलने से रोक सके। नतीजा सारे देश की नजरें इस बात पर जा टिकीं कि 22 जुलाई को संसद में क्या होगा। सरकार रहेगी या जाएगी। इस आपाधापी में ये सवाल कहीं पीछे छूट गया कि आखिर जिस परमाणु करार को लेकर इतनी हाय तौबा मची उससे आने वाले समय में देश को क्या और कितनी सहूलियत मिलेगी। सौ करोड़ की इस आबादी में न कोई ये सवाल पूछने वाला था और न ही कोई जवाब देने वाला। अविश्वास प्रस्ताव पर हुई बहस के दौरान भी शेरो शायरी औऱ जुमलों के साथ कटाक्ष का तड़का तो था लेकिन परमाणु करार पर एक स्वस्थ बहस का सर्वथा अभाव था। खैर वो दिन भी आया जब मनमोहन सिंह सरकार को संसद में विश्वास मत हासिल करना था। सारे देश की निगाहें संसद पर टिकी थीं। बहस मुबाहसों का दौर शुरू हुआ। आरोप लगे तो उनके जवाब भी आए। रेल मंत्री लालू यादव भी खूब बोले। राहुल गांधी ने भी भारी शोर शराबे के बीच विनम्रता से अपनी बात कही। इसी बीच संसद के इतिहास में वो पल भी आया जिसने उसके पचास साल के गौरवशाली इतिहास पर कालिख पोत दी। भाजपा के तीन सांसदों ने संसद में हजार हजार रुपए के नोट लहराते हुए ये आरोप लगाया कि सरकार ने उन्हें संसद से गैर हाजिर रहने के लिए रिश्वत दी। एक बार फिर संसद को हमारे माननीयों ने शर्मसार किया। आपको याद दिला दें कि जिस लोकसभा को बचाने या भंग करवाने की कोशिशें हो रही थीं उसी ने अपने कुछ सदस्यों को कुछ महीनों पहले इसलिए अयोग्य घोषित कर दिया था कि उन्हें या तो सांसद निधि की राशि में अनियमितता करने का दोषी पाया गया था अथवा उन पर प्रश्न पूछने के लिए धन प्राप्त करने के आरोप थे। एक बार फिर सांसदों की खरीद फरोख्त के आरोप भारतीय राजनीति के गलियारों में गूंजे थे। बहरहाल मतदान के बाद सरकार ने 19 वोटों से विश्वासमत हासिल कर लिया था लेकिन जोड़तोड़ और धनबल की राजनीति ने जिस तरह से देश की राजनीति में पलीता लगाया है उससे मन में एक ही सवाल उठता है कि क्या अब आंकड़ों का खेल ही सरकारों का भाग्य निर्माता होगा? हमें जो संवैधानिक परंपराएं विरासत में मिली हैं, क्या उन्हीं के सहारे आगे बढ़ना होगा या देश, काल और परिस्थितियों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए सरकार चुनने की किसी नई व्यवस्था की न सिर्फ मांग करनी चाहिए, उसके लिए एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन भी खड़ा करना होगा।

शनिवार, 7 जून 2008

महंगाई की राजनीति

07 जून 2008


उबली जन-मन भावना, महंगाई की आंच,

कीमत इतनी नुकीली, रस्ते पर ज्यों कांच।

रस्ते पर ज्यों कांच, बालकों को बहलाओ,

बटुआ लहूलुहान, न शॉपिंग करने जाओ।

चक्र सुदर्शन कहे— 'चाय है कैसी बबली?'

'गैस बचाने के चक्कर में आधी उबली।'

अशोक चक्रधर साहब की ये रचना देश में लगातार बढती महंगाई का सटीक चित्रण करती है। दो दिन बीते हैं, अभी केंद्र सरकार ने पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों में इजाफा किया है। कहते हैं मजबूरी है, अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं और देश में उन कंपनियों को भारी घाटा उठाना पड़ रहा है, जो इनकी सप्लाई करती हैं। सरकार के इस फैसले की जनता के बीच मिली जुली प्रतिक्रिया हुई। कुछ ने उसकी मजबूरी को समझते हुए इस फैसले को जायज बताया तो कुछ ने खुद को ठगा हुआ महसूस किया। उधर तमाम दूसरे राजनीतिक दल औऱ मीडिया तो जैसे तड़े बैठे थे कि सरकार बस पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में वृद्धि का फैसला भर करे, उसके बाद के तमाशे की जिम्मेदारी तो उनकी है। विपक्षी दलों ने महंगाई को लेकर जंग तो पहले ही छेड़ रखी थी, पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में हुए इजाफे ने तो उन्हें मन मागी मुराद दे दी। पहले मीडिया के सामने बयानों के ज़रिए भड़ास निकाली कि केंद्र सरकार जन विरोधी है, उसने जनता की जेब पर डाका डाला है, चेतावनियों का भी दौर चला, लोग सड़कों पर भी उतरे, पुतले भी फूंके गए, नारे भी लगाए गए और जनता से अपील की गई कि वो सरकार को उसके किए की सजा चुनाव में उसे हराकर दे। सरकार के सहयोगी वाम दलों ने भी सरकार के इस फैसले पर त्यौरियां तरेरने में कोताही नहीं बरती। सहयोगियों का भी मिजाज बिगड़ते देख यूपीए के सबसे बड़े दल कांग्रेस ने अपनी राज्य सरकारों से कहा कि वे अपने अपने राज्यों में पेट्रोलियम उत्पादों पर सेल्स टैक्स में कमी करके जनता पर पड़ेने वाले बोझ को कम करें। दिल्ली, पश्चिम बंगाल, केरल, आंध्र प्रदेश औऱ तमिलनाडु ने तत्काल कटौती को घोषणा की लेकिन कुछ राज्यों ने बिक्री कर घटाने से साफ इंकार कर दिया। कुल मिलाकर महंगाई की भट्टी पर अपने अपने फायदें की रोटियां सेंकने मे कोई भी राजनीतिक दल पीछे नहीं रहना चाहता था। समाज का चौथा स्तंभ भी महंगाई के चलते जनता को मिले दर्द की पराकाष्ठा को व्यक्त करने के लिए मरा जा रहा था। तेल में आग, किचन में आग, बटुए में आग, मार डाला, जेब पर डाका जैसे स्लोगनों को बड़े बड़े हर्फों में बैक ड्राप पर उकेरकर मानो जनता को ये एहसास दिलाने की कोशिश की जा रही थी कि भइया महंगाई बढ़ गई है, गैस महंगी हो गई है, पेट्रोल औऱ डीजल भी महंगा हो गया है, एंकर चिल्ला चिल्ला कर जनता से एक ही सवाल पूछ रही थी कि गैस महंगी होने से किचन कैसे मैनेज करेंगे, पेट्रोल औऱ डीजल महंगा होने से गाड़ी कैसे मैनेज करेंगे, महीने के बजट पर इसका क्या असर पड़ेगा। जनता बेचारी हक्की बक्की होकर महंगाई को लेकर चलने वाले इस तमाशे को देख रही थी। गुर्जरों के बंद का दंश अभी झेल ही रही थी कि अपने हितैषियों द्वारा आहूत बंद ने उसकी मुश्किलें और बढ़ा दीं। महंगाई और बंद के दो पाटों में बेचारी जनता पिस रही थी और हमारे नेता इस समस्या से निपटने के बजाए राजनीतिक जोड़तोड़ में लगे हुए हैं। मीडिया भी स्वस्थ बहस के बजाए डंडा लेकर सरकार के पीछे पड़ गई और इस फैसले के चलते आने वाले लोकसभा चुनाव के दौरान सरकार को हने वाले नफे नुकसान की गणित समझाने लगी। जिस तरह से महंगाई को लेकर हल्ला मच रहा था और सरकार को कोसा जा रहा था, मैं ये सोचने के लिए मजबूर हो गया कि क्या अगर भाजपा या फिर कोई और दल सत्ता में होता तो तेल की कीमतें न बढतीं। क्या तब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की बढ़ती कीमतें नजरअंदाज कर दी जातीं, क्या तब कोई ऐसा रास्ता तलाश लिया जाता जिससे आम जनता को बढ़ती मंहगाई के इस दौर में पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में होने वाली वृद्धि के असर से बचाया सकता, अगर हां तो क्या विपक्ष में बैठी भाजपा को इस समस्या के समाधान के लिए सत्ता पर काबिज होना ज़रूरी है, क्या वो विपक्ष में बैठकर सरकार को इस संबंध में सकारात्मक राय नहीं दे सकती, क्या जनता के दर्द को हथियार बनाकर उसके ज़रिए राजनीति करना उचित है। सरकार के सहयोगी की भूंमिका निभा रहे उन वामदलों को देखकर मुझे और ज्यादा कोफ्त होती है जो सहयोगी के बजाए दुश्मन की भूमिका कुछ ज्यादा अच्छी तरह से निभा रहे हैं। सरकार के हर फैसले को विरोध उनकी आदत बन चुका है। किसी मसले पर आम राय बनाकर उसका हल निकालने के बजाए सड़क पर उतरकर उछलकूद करना उन्हें ज्यादा अच्छा लगता है। जाहिर है ये लोग सत्ता की मलाई भी खाना चाहते हैं और जनता के हमदर्द बने रहने का ढोंग भी करना चाहते हैं। दुनिया के विकसित देशों जी-8 के ऊर्जा मंत्रियों की बैठक जापान में हो रही है, जिसमें तेल की बढ़ती क़ीमतों के दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले गंभीर असर पर विचार किया जाना है। ईश्वर से दुआ है कि इस बैठक में कुछ सार्थक निकले जिससे महंगाई के बोझ तले कराह रही जनता को कुछ राहत मिले वरना तो फिर भगवान ही मालिक है इस देश का और इस देश की व्यवस्था का।

post by-
anil kumar verma

मंगलवार, 3 जून 2008

ये कैसा फ़रमान

03 जून 2008
आज हिन्दी दैनिक अमर उजाला के संपादकीय पेज पर एक लेख पढ़ा। जानकारी मिली कि पशुओं के उत्पीड़न को लेकर देश के एनीमल वेलफेयर बोर्ड की बॉलीवुड के निर्माताओं पर त्योरियां चढी हुई हैं। बोर्ड ने अपने ताजा दिशा निर्देशों में शेर, बाघ, तेंदुए औऱ बन्दर को लेकर दृश्यों के फिल्मांकन पर रोक लगा दी है। साथ ही इस निर्देश में दूसरे अन्य जानवरों के साथ शूटिंग के लिए भी एक महीने पहले अनुमति लेने की ताकीद की गई है। जिस तरह से दुनिया भर में लुप्त होते पशुओं को बचाने के लिए, उनके संरक्षण के लिए विभिन्न संस्थाओं ने अपने अपने स्तर से मुहिम छेड़ रखी है वो काबिले तारीफ है। निश्चित ही इस तरह के किसी भी प्रयास का स्वागत होना चाहिए लेकिन बोर्ड के इस दिशा निर्देश से उसकी मंशा पर सवाल खड़े होते नजर आ रहे हैं। सबसे पहले तो ये कि क्या पशुओं के फिल्मांकन करने मात्र से उनका उत्पीड़न हो जाता है। दूसरा ये कि बालीवुड ने अपनी फिल्मों के ज़रिए पशुओं को लेकर समाज को जो सकारात्मक संदेश देने की कोशिश अब तक की है क्या बोर्ड ने उन पर गौर करके इन निर्देशों को जारी किया है। जिस तरह से हाथी मेरा साथी, मै तेरा दुश्मन, तेरी मेहरबानियां, महाराजा और नागिन जैसी फिल्मों ने पशुओं को लेकर समाज को जो संदेश पहुंचाने की कोशिश की है क्या बोर्ड ने इन दिशा निर्देशों को जारी करते समय उन्हें ध्यान में रखा था क्योंकि इन फिल्मों के कारुणिक दृश्य आज भी आंखों में नमी ला देते हैं और बहुत कुछ सोचने के लिए मजबूर करते हैं। किस तरह से इंसान का लालच पशुओं के अस्तित्व के लिए खतरा बन सकता है, उसे दर्शाने के लिए बॉलीवुड से बेहतर माध्यम कोई हो सकता है भला। अगर बोर्ड ने इन बातों को ध्यान में रखकर नए दिशआ निर्देश जारी किए हैं तो उसकी इस पहल का स्वागत है। हालांकि इसकी गुंजाइश मुझे न के बराबर लगती है। दरअसल बीते कुछ दिनों में जिस तरह से सरकारी महकमे बॉलीवुड के खिलाफ मोर्चा खोले नजर आए उससे तो मुझे कम से कम यही लगा कि इस तरह की सारी कवायद महज लोकप्रियता पाने की ललक है इसके सिवा कुछ भी नहीं। बीते दिनों केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने जिस तरह से बॉलीवुड के कुछ लोकप्रिय अभिनेताओं के खिलाफ धूम्रपान के विज्ञापनों को लेकर टीका टिप्पणी की उससे
तो यही संदेश गया। ये कुछ बोलेंगे फिर वो कुछ बोलेंगे फिर जब मीडिया उसे मसालेदार बनाकर जनता के सामने परोसता है तो सुर्खियां तो बनती ही हैं। बात करें एनीमल वेलफेयर बोर्ड की तो मुझे लगता है उसका ध्यान पशुओं की संरक्षा और सुरक्षा पर कम खुद की पब्लीसिटी पर ज्यादा है। वरना बीते कुछ महीनों में जिस तरह से रिहाइशी इलाकों में जंगली पशुओं की आमद औऱ उसके बाद उनके शिकार की घटनाएं बढीं हैं वो इन पर रोक लगाने के लिए कुछ सार्थक कदम उठाता न कि इस तरह के बेमतलब और अतार्किक फरमान जारी कर अपना वक्त बरबाद करता। मीडिया में हर दूसरे दिन खबर आती है कि संरक्षित पशुओं की खालों की तस्करी करने वाले गिरोह का भंडाफोड़, दुर्लभ किस्म के कछुओं की तस्करी करने वाला गिरोह पुलिस की गिरफ्त में और भी न जाने क्या क्या, लेकिन बोर्ड इस तरह से अवैध शिकार पर रोक लगाने के लिए किसी तरह की पहल करने के बजाए बेकार के फरमान जारी करने मे व्यस्त है। संसारचन्द जैसे न जाने कितने पशु तस्कर लगातार संरक्षित पशुओं के शिकार और तस्करी मे लिप्त हैं लेकिन उन पर किसी तरह की नकेल नहीं कस पा रही है। एक औऱ बात जो उस सम्पादकीय में कही गई वो भी मुझे ठीक लगी कि इस तरह के फरमान हमारे देश में अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला हैं। कल को बाल अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ रही सरकारी औऱ गैर सरकारी संस्थाएं फिल्मों मे बच्चों के काम करने को उनका शोषण करार देने की मांग करेंगी तो अनोखा बंधन, नन्हें जैसलमेर, तारे ज़मीन पर, भूतनाथ, हम हैं राही प्यार के जैसी ह्रदयस्पर्शी फिल्में कहां से देखने को मिलेंगी। समाज में फैली तमाम भ्रातियों औऱ बुराइयों को आईना दिखाने में बालीवुड की अहम भूमिका है। अगर उसके योगदान को नकारकर हम उसके कुछ नकारात्मक पहलुओं को लेकर हो हल्ला मचायें ये कहां तक उचित है। एनीमल वेल फेयर बोर्ड को मेरी सलाह है कि वो अपनी ऊर्जा व्यर्थ के कामों की बजाए कुछ सार्थक करने में खर्च करे। इस मामले में मैं अपने तमाम ब्लागिए यार दोस्त और दूसरे भाई बंधुओं की राय जानने का इच्छुक हूं। कृपया इश लेख पर टिप्पणी कर अपने सुझावों से ज़रूर अवगत कराएं। धन्यवाद।

post by-
anil kumar verma

रविवार, 1 जून 2008

क्यों बिगड़ा रिजल्ट

1 जून 2008
जब से शाहरुख खान की फिल्म ओम शांति ओंम और करीना कपूर की टशन सिनेमाघरों में पहुंची है लोगों को लिखने और चर्चा करने का एक नया और ताजा विषय मिल गया है। शाहरुख की सिक्स पैक एब्स और करीना के जीरो फिगर को लेकर समाज को चौथा स्तंभ भी काफी कांशस नजर आया। शाहरुख के साथ हुई हर बातचीत में जहां उनकी सिक्स पैक एब्स की चर्चा हुई वहीं करीना के जीरो फिगर को भी घुमाघुमा कर टेलीविजन स्क्रीन मे चार चांद लगाने की कोशिश की गई। इसका असर ये हुआ कि शहरों से लेकर गांव तक में हर चौराहे और नुक्कड़ पर युवा इसी विषय पर बतियाते दिखाई दिए। उनमें शाहरुख औऱ करीना की तरह दिखने का जुनून घर कर गया। नतीजा ये हुआ कि इनके दिन का आधा वक्त जिम में पसीना बहाने में गुजरने लगा। जिस संजीदगी और तन्मयता से युवाओं ने शाहरुख और करीना को फॉलो करना शुरू किया वो वास्तव में काबिले तारीफ था। इसी बीच खबर आई कि यूपी बोर्ड के अंतर्गत होने वाली हाईस्कूल की परीक्षा में 15 लाख छात्र फेल हो गए। स्वकेंद्र प्रणाली के खात्मे ने इन छात्रों के भविष्य पर कालिख पोत दी। मुझे लगा समाज को जागरुक करने की मुहिम में लगा हमारा मीडिया इस बात को भी गंभीरता से लेगा और हाईस्कूल के नतीजों को लेकर व्यापक स्तर पर बहस जरूर छिड़ेगी। इन कारणों की पड़ताल होगी कि क्या केवल छात्र ही इस स्थिति के लिए जिम्मेदार हैं यो फिर इसके पीछे कहीं शिक्षकों का भी योगदान है लेकिन कुछ जगहों पर छोड़ कहीं कोई इस मामले को लेकर चिंतित नहीं दिखा। इस बीच रबीश जी के कस्बे से खबर आई कि वे उत्तर प्रदेश की मर चुकी शिक्षा प्रणाली के लिए एक शोक सभा के आयोजन में लगे हैं और देश भर के लोगों को उन्होंने निमंत्रण भी भेजा है। हालांकि इस सभा में उन्होंने सिर्फ फेल होने वाले लड़कों और उनके परिवार वालों को ही आमंत्रित किया है। लड़कियों को इसलिए नहीं किया क्योंकि उनके उत्तीर्ण होने का प्रतिशत पिछली बार की ही तरह लड़कों से बेहतर है। इसी बीच उन्होंने नकल के समाजशास्त्र की परिभाषा भी समझा दी और प्रदेश की बेटियों की सफलता पर उन्हें सलामी भी ठोंक दी। इतना ही नहीं उन्होंने तो फेल हुए छात्रों को लेकर राजनीति करने का मार्ग भी सुझा दिया। रबीश जी ने जिस व्यंगात्मक अंदाज में प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था पर चोट की वो दिल को छू गया। आप सोच रहे होंगे मैनें पहले शाहरुख की सिक्स पैक एब्स औऱ करीना के जीरो फिगर की चर्चा की लेकिन फिर अचानक यूपी की शिक्षा प्रणाली के बारे में बात करने लगा। दरअसल मैं ये समझने और जानने की कोशिश कर रहा हूं कि जब शाहरुख की बॉडी और करीना के फिगर को युवा इतनी संजीदगी से लेते हैं तो फिर पढ़ाई को क्यों नहीं। क्या वजह है कि माता-पिता,शिक्षक कोई भी इन छात्रों का झुकाव उन किताबों की तरफ न करा सका जिनसे उनकी जिन्दगी संवरनी है। उल्टे वो इस जुगाड़ में लगे रहे कि कैसे वो अपने घर के चिरागों को नकल कराकर कैरियर की एक सीढ़ी उपर चढ़ा दिया जाए। चिराग भी इसी भरोसे में रहे कि नकल का तेल उनकी बाती की लौ में रौशनी का सबब बनेगा ही। परिणाम सामने आए तो पांच लाख चिरागों की जिन्दगी नाकामी के अंधेरों में गुम होती दिखाई दी। बावजूद इसके इस मामले में कहीं कोई बहस या चर्चा होती नहीं दिखी। मैं इसी वजह की तलाश में हूं लेकिन जवाब अभी तक नदारद है। साथ ही मैं शिक्षा जगत की सतत सुधार प्रक्रिया में शामिल लोगों का ध्यान भी इस ओर आकृष्ट करना चाहता हूं कि वे पढ़ाई का कोई ऐसा तरीका खोजें जो इन छात्रों को तो क्लासरूम और किताबों से बांधे ही साथ ही उनके गुरुओं को भी इस बात के लिए प्रेरित करे कि वो अपने छात्रों के साथ संजीदगी से क्लासरूम में कुछ समय बिताएं। अभिभावकों से अनुरोध है कि वो अपने बच्चों को समझाएं कि कड़ी मेहनत का कोई विकल्प नहीं है।

रविवार, 25 मई 2008

कर्नाटक चुनाव के निहितार्थ




26 मई 2008
कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्र की यूपीए सरकार अभी अपने चार साल पूरे होने के जश्न की खुमारी ही मिटा रही थी कि कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नतीजों ने उसकी नींद उड़ा दी। 224 में से केवल 80 पर कामयाबी और प्रतिद्वन्द्वी भाजपा के खाते में आईं उसकी उम्मीद से कही ज्यादा 110 सीटें। उत्तराखंड, पंजाब और केरल के बाद कर्नाटक में मिली हार ने कांग्रेस को चिंतन मंथन के लिए मजबूर कर दिया है। कांग्रेस के लिए इस हार के गंभीर निहितार्थ हैं। लगातार देश के तमाम राज्यों में उसे मिल रही असफलता और उसके उलट भाजपा को मिल रही सफलता खास तौर से दक्षिण के किसी राज्य में बहुमत मिलना ये दर्शा रहा है कि राष्ट्रीय स्तर पर कही न कहीं कांग्रेस कमजोर हो रही है और भाजपा दिनों दिन मजबूत हो रही है। सवाल उठता है कि आखिर ऐसा हो क्यों रहा है। दरअसल कांग्रेस को राज्यों की राजनीति भी केंद्रीय परिपाटी के मुताबिक करना ही मंहगा पड़ रहा है। राज्यों के चुनाव स्थानीय मुद्दों पर लड़े जाते हैं और स्थानीय नेताओं के किए-धरे के आधार पर ही राजनीतिक दलों की किस्मत तय होती है। राज्यों की जनता अपने बीच के व्यक्ति को ही सत्ता में देखना चाहती है, जिससे उसे अपनी बात कहने सुनने के लिए इधर उधर भटकना ना पड़े। उन्हें लगता है कि उनके बीच का आदमी उनकी बात ध्यान से सुनेगा और उनकी समस्याओं का निराकरण करेगा। भाजपा ने यही किया औऱ एक ऐसी पार्टी के तौर पर अपने को लोगों के सामने पेश किया जो एक स्थिर सरकार बना सकती है। दूसरी बात थी राज्य में उनका नेतृत्व यानी मुख्यमंत्री के रूप में येदुरप्पा का चेहरा। एक समय था जब राष्ट्रीय राजनीति में कहा जाता था कि अटल जी प्रधानमंत्री बनने लायक हैं पर उन्हें अवसर नहीं मिल रहा है। कुछ इसी तरह की छवि राज्य में येदुरप्पा की रही है। भाजपा इस बात को भी प्रचारित करने में और लोगों के सामने रखने में सफल रही कि उनके साथ एक राजनीतिक धोखा हुआ है और उन्हें अपनी बारी आने पर काम करने का मौक़ा नहीं मिला है। जबकि ठीक इसके उलट कांग्रेस ऐसा करने में नाकाम रही। हमेशा की तरह अपनी पुरानी परिपाटी के मुताबिक कर्नाटक चुनाव में भी कांग्रेस ने किसी ऐसे व्यक्ति को आगे नहीं किया जो वहां की जनता के दिल के करीब होता, जो लोगों को ये भरोसा दिला पाता कि कांग्रेस का हाथ उनके साथ है। लिहाजा जनता ने जब फैसला सुनाया तो वो कांग्रेस के हित में नहीं रहा। दूसरा झटका कांग्रेस को मायावती ने दिया। नहीं-नहीं करते हुए भा बसपा ने कांग्रेस के वोट बेंक में सेंध लगाई। जिसका सीधा फायदा भाजपा ने उठाया और आगे भी उठाने की कोशिश करेगी। मुझे ऐसा लगता है कि पिछले लोकसभा चुनाव में मिली जीत के बाद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के करिश्माई नेतृत्व का जो तिलिस्म बना था वो अब दरकने लगा है। मैं ये नहीं कह रहा कि कर्नाटक की हार के बाद केंद्र सरकार पर संकट आन खड़ा हुआ है लेकिन अगर कांग्रेस ने इस हार को दरकिनार किया तो आने वाले लोकसभा चुनाव में उसे इसकी कींमत चुकानी पड़ सकती है। कांग्रेस अध्य़क्ष को ये समझना होगा कि राजनीतिक दर एनजीओ की तरह नहीं चलते, साथ ही ये भी कि इंदिरा गांधी की शैली का राजनीति इक्कीसवीं सदी में नहीं चलने वाली, क्योंकि उनमें न तो इंदिरा गांधी जैसा राजनीतिक कौशल है, न ही बड़े फैसले लेने का जिगर, न ऐसी सार्वदेशिक अपील जो अकेले अपने दम पर वोट दिला सके और अब न ही उतना कमजोर विपक्ष है। पिछली बार के लोकसभा चुनाव में सत्ता का दंभ राजग को ले डूबा था, इस बार भी उनका नेतृत्व बिखऱता नजर आ रहा था लेकिन लगातार चार राज्यों के विधानसभा चुनाव में मिली सफलता से उनके हौंसले बुलंद है औऱ एकजुटता नजर आने लगी है। भाजपा की परेशानी बाहरी नहीं है आंतरिक है। अंतर्कलह उसकी राह की सबसे बड़ी बाधा है, जिस पर काबू उसे काबू पाना होगा और अगर ऐसा हो गया तो केंद्र की सत्ता उससे ज्यादा दिनों तक दूर नहीं रहेगी। दूसरी ओर आठ साल तक सत्ता से दूर रहने के बाद पिछले चार सालों से सत्ता सुख भोग रही कांग्रेस ने अगर अपनी चुनावी रणनीति नहीं बदली तो उसे खामियाजा भुगतने के लिए तैयार रहना होगा। दरअसल कांग्रेसियों को ये मुगालता हो गया है कि सोनिया और राहुल की बदौलत वो चुनावी जंग जीत जायेंगे। हालांकि
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी कई बार पार्टी के बड़े नेताओं और मंत्रियों को चेता चुकी हैं कि वे लोगों के बीच जाएं और कार्यकर्ताओं को सम्मान और समय दें। कांग्रेस के नेता अभी तक उनकी बात को अनसुना करते रहे लेकिन अब उन्हें भी खतरे की घंटी सुनाई देने लगी है। कांग्रेस को महंगाई पर भी नजर रखनी होगी। अगर वो ये मानकर बैठी कि कर्नाटक की हार में इसकी कोई भूमिका नहीं है तो ये उसकी सबसे बड़ी भूल होगी। कर्नाटक में सत्ता से वंचित रही कांग्रेस यह दावा कर रही है कि इस राज्य के चुनाव नतीजों का केंद्रीय सत्ता पर असर नहीं पडे़गा, लेकिन कुल मिलाकर यह एक कमजोर दावा होगा। हां, कांग्रेस इस पर संतोष व्यक्त कर सकती है कि उसका वोट प्रतिशत भी बढ़ा और सीटें भी। यहां एक और वजह का जिक्र करना चाहूंगा जो राजनीतिक दलों के लिए मुसीबत बन चुकी है। दरअसल राजनेता ये मानकर चलते हैं कि जनता की याददाश्त काफी कमजोर होती है और वो सब कुछ आसानी से भुलाकर उनकी गलतियों को माफ कर देती है लेकिन उन्हें अब ये समझना होगा कि भारतीय राजनीति में अब ये वर्जना टूटती नजर आ रही है। जनता चार साल में सरकारों द्वारा किए गए सारे कामों का लेखा जोखा रखती है और चुनाव नजदीक देख एक साल मे किए गए काम के आधार पर अपने मतों का निर्धारण करना उसने छोड़ दिय़ा है। भाजपा का शाइनिंग इंडिया का नारा उसके गले नहीं उतरा था तो कांग्रेस को ऐसा क्यों लगा कि नौ फीसदी जीडीपी की विकास दर का ग्राफ उसका राजनीतिक ग्राफ बढ़ा देगा। पंजाब, उत्तराखंड और अब कर्नाटक की हार ने उसका ये मुगालता जरूर तोड़ा होगा। भाजपा को भी हालिया चुनावों में मिली जीत से ज्यादा खुश नहीं होना चाहिए क्योंकि देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में अगर वो पस्त है तो मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी उसकी हालत बेहतर नहीं कही जा सकती। यह ठीक है कि भाजपा अब 11 राज्यों में सत्ता में होगी, लेकिन बात तो तब बनेगी जब यह संख्या घटने न पाए। यदि भाजपा को केंद्र की सत्ता में वापसी करनी है तो उसे अपने कुछ मजबूत और भरोसेमंद सहयोगी भी चुनने होंगे। कुल मिलाकर भारतीय राजनीति की राहें दिनों दिन रपटीली होती जा रही हैं और उन पर चलने के लिए राजनीतिक दलों को अपनी चाल-ढाल बदलनी होगी।

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anil kumar verma

शनिवार, 24 मई 2008

समाज का नासूर




24मई 2008
आज जो कुछ लिखने जा रहा हूं उस विषय पर काफी कुछ लिखा जा चुका है। मुझसे पहले न जाने कितने लोग इस समस्या को लेकर लोगों को जागरुक करने का काम कर चुके हैं लेकिन न हालात बदले हैं और न बदलते दिख रहे हैं। फिर भी मैं तो अपने अंदर उठ रहे द्वंद्व को शब्दों का रुप दूंगा ही। विषय है जातिवाद के साथ आरक्षण और संदर्भ में है राजस्थान। साल भर पहले गुर्जरों ने खुद को अनुसूचित जाति में शामिल करने को लेकर जो आंदोलन छेड़ा था वो एक बार फिर जोर पकड़ चुका है। दो दिनों में 39 मौतें हो चुकी हैं। राज्य के 15 जिले इस आंदोलन की चपेट में हैं। तोड़फोड़, आगजनी और हिंसा के बीच सेना के जवान स्थिति को काबू में करने की कोशिश कर रहे हैं। सरकार ने बातचीत के लिए गुर्जर नेताओं को न्योता भेजा है लेकिन क्या इस समस्या को अब वातानुकूलित कमरों में बैठकर हल किया जा सकता है। तमाम घरों के चिराग बुझ गए,मांओ की गोद सूनी हो गई,जाने कितने ही परिवारों की उम्मीदें इस हिंसा की भीड़ में खो गईं। आखिर किसकी वजह से। ये सवाल जब मन में उठता है तो भारतीय राजनीति का ऐसा विद्रूप चेहरा आंखों के सामने उभरता है कि बस पूछिए मत। जाति, धर्म मजहब और वर्णों में हमारे समाज को बांटने वालों ने भी नहीं सोचा होगा कि हालात इस कदर बेकाबू हो जायेंगे। सत्ता के लालच में चूर हमारे माननीय नित नए राजनीतिक समीकरण तलाशते हैं, नई गोटियां बिठाते हैं, ये सोचने में अपनी जिन्दगी का तमाम वक्त जाया करते हैं कि धर्मों और जातियों में बंटे समाज को अब और किन खाचों में बांटा जाए। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती दलितों के पत्तों के साथ राजनीतिक बाजी खेलते खेलते थक गईं तो दलित-ब्राह्मण गठजोड़ कर अपना हाथी सत्ता के सिंहासन तक पहुंचाया, सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव एम-वाई समीकरण साधते हैं तो चौधरी अजित सिंह किसानों और जाटों को एक छत के नीचे लाने की कसरत करते हैं, किस किस के बारे में लिखूं सभी एक ही कश्ती के सवार हैं। ऐसा ही कुछ राजस्थान की मुख्यमंज्ञी वसुंधरा राजे ने किया। साढ़े तीन साल पहले राजस्थान के मतदाताओं ने मुख्यमंत्री के रूप में वसुंधरा राजे का राजतिलक किया तो उन्होंने उम्मीद की थी कि वे राज्य को एक परिवार की तरह चलाएँगी लेकिन हालात कुछ और ही गवाही देते हैं। इस परिवार में कभी जाति के नाम पर विखंडन हुआ तो कभी सियासत में आवाम को क्षेत्र के नाम पर विभाजित किया गया। अब आरक्षण के नाम पर दो समुदायों में संघर्ष के हालात बन गए हैं। स्थिति बेकाबू हुई तो सरकार ने कहा गूजरों से आरक्षण का कोई वायदा नहीं किया गया था। जबकि गूजर नेता कहते हैं, वसुंधरा राजे मुख्यमंत्री बनने से पहले जब परिवर्तन यात्रा पर गईं थी तो उन्होंने कहा था कि मैं आपकी समधन हूँ और अगर मैं सरकार में आई तो आपको अनुसूचित जनजाति का दर्जा दूंगी। नतीजा आज सामने है, उन्मादी नारे, हिंसक भीड़ और राजमार्गों पर बहता लहू धीरे धीऱे राजस्थान की नियति बनता जा रहा है। एक वर्ग दूसरे वर्ग के खून का प्यासा हो रहा है। क्यों, शायद इसीलिए कि-

जातिवाद ने, प्रांतवाद ने, भाषा ने बांटा है।
वर्ण-भेद के विषधर ने मानव मन को काटा है।


धर्मों और जातियों में बंटे समाज को उसके उत्थान के नाम पर हमारे राजनेताओं ने आरक्षण का जो झुनझुना थमाया वो ऐसा बजा कि उसकी गूंज से देश अब तक दहल रहा है। शिक्षा और नौकरी में आरक्षण के ज़रिए बेहतर सुविधाओं के सपने दिखाकर समाज की तस्वीर बदलने की कोशिश की कीमत आज हम और आप ही चुका रहे हैं और ऐसा करने वाले अपनी इसी कोशिश का राजनीतिक लाभ उठाकर अपनी सेफद खादी को और सफेद कर रहे हैं। इन लोगों ने राष्ट्रीय एकता और अखंडता के सामने कट्टरता, संकीर्णता और स्वार्थवृत्ति का ऐसा जाल बुन दिया है जिससे बचकर निकलना असंभव सा लगने लगा है। हमारे सामने यही चुनौती है कि हम क्षुद्र मानसिकता की गलियों से निकलकर व्यापक द्रष्टिकोण अपनाएं,संयम और सहनशीलता के साथ सदभावना का परिचय दें, आगाह करें सभी राजनीतिक दलों, धार्मिक समूहों और वर्गो को कि सामाजिक स्तर पर विचार न करके मनुष्य के तौर पर मनुष्य के अनिवार्य अधिकारों की प्रभुता को स्वीकार करें और एक उच्च नैतिक आदर्श पेश कर कवि नीरज के शब्दों में एक ऐसे हिन्दुस्तान का निर्माण करें-

अब तो मजहब कोई ऐसा चलाया जाए
जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए
मेरे दु:ख दर्द का तुझ पर हो असर कुछ ऐसा
मैं रहूं भूखा तो तुझसे भी न खाया जाए।


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anil kumar verma

शुक्रवार, 23 मई 2008

मुश्किल में सेना

24 मई 2008
हमारी राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने 23 मई यानि शुक्रवार को उत्तरी कश्मीर के बारामुला इलाके का दौरा किया और सीमाओं पर तैनात सेना के जवानों से मुलाकात कर उन दिक्कतों के बारे में जाना जिनसे उन्हें दो-चार होना पड़ता है। इस दौरान राष्ट्रपति ने कहा कि भारतीय सेना के जवान किसी भी घटना से निपटने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं और इन लोगों के हाथों में देश की सीमाएं सुरक्षित हैं। मैं यहां ये कहना चाहूंगा कि सेना के जवानों के हाथों में तो हमारा देश और भविष्य सुरक्षित है लेकिन उन सैनिकों का क्या जो अपने परिवारों और उनके भविष्य की चिंता में दिन रात घुले जा रहे हैं और निदान न मिलने पर या तो सेना छोड़कर जा रहे हैं या फिर मौत को गले लगा रहे हैं। सैन्य पृष्ठभूमि से जुड़े विषयों पर बॉलीवुड खासा मेहरबान रहा है। कई फिल्में बनी और कई लेख भी लिखे गए लेकिन आजकल सेना की चर्चा कुछ दूसरी ही वजहों से होती है। दुश्मन देश की सेनाओं के साथ साथ उन्हें एक और दुश्मन तनाव से दिन रात लड़ना पड़ता है। लगातार घर परिवार से दूर रहने और प्रतिकूल परिस्थितियों में काम करने के चलते जवान तनाव और अवसाद से घिर जाते हैं। जब अवसाद का ये गुबार फूटता है तो सामने आता है किसी जवान द्वारा आत्महत्या या फिर अपने ही किसी सहयोगी या अधिकारी की हत्या का मामला।
ऐसी घटनाओं में मारे गए सैनिकों की संख्या को जोड़ें तो पाएँगे कि जितने जवान आतंकवादी हमलों में मारे गए उनसे लगभग दोगुने इन घटनाओं में मरे। मेरे पास ताजा आंकड़े तो मौजूद नहीं हैं लेकिन बात करें 2006 की तो इस साल में 72 सैनिक आतंकवादी हमले में मारे गए, वहीं 102 सैनिकों ने आत्महत्या की, 23 एक-दूसरे की गोली का निशाना बने और नौ ने अंधाधुंध गोलीबारी में अपनी जान गँवाई और इन सबके पीछे जो कारण रहा वो था तनाव। ऐसी घटनाओं से उबरने के लिए सेना ने सैनिकों और अधिकारियों के बीच औपचारिक और अनौपचारिक संवाद को मजबूत करने का काम किया है और अधिकारियों, मनोचिकित्सकों, और धार्मिक शिक्षकों का परामर्श भी लिया है लेकिन इसके अलावा एक और समस्या ने सेना से जवानों का मोहभंग करने का काम शुरू कर दिया है और वो है सेना के मुकाबले कार्पोरेट जगत द्वारा अपने कर्मचारियों को दी जाने वाली भारी भरकम तनख्वाह। प्रतिकूल परिस्थितियों के चलते उपजते तनाव और परिवार की चिंता ने जवानों के साथ सेना के अफसरों को भी कार्पोरेट जगत की ओर खींचना शुरू कर दिया। आलम ये है कि सेना व वायुसेना में करीब 12-12 हजार ऑफिसरों के पद रिक्त हैं और हजारों अधिकारियों ने नौकरी छोड़ने के आवेदन दे रखे हैं। कंपनियां भी डिफेंस के अनुशासित, दक्ष, कुशल व अच्छे प्रबंध जानने वाले अधिकारियों को चार से पांच गुना अधिक तनख्वाह देकर अपने साथ जोड़ने में दिलचस्पी दिखाती हैं। एक नजर डालते हैं सेना द्वारा दी जाने वाली तनख्वाह पर-

कैप्टन- बेसिक 8 हजार, मकान किराए भत्तों सहित 20 हजार
मेजर- बेसिक 12 हजार, भत्तों सहित 27 हजार
कर्नल- बेसिक 16 हजार, भत्तों सहित 35 हजार


जबकि कार्पोरेट जगत से जुड़ा कोई भी शख्स जब अपना कैरियर शुरू करता है तो उसका सैलरी पैकेज इससे कहीं बेहतर होता है। रक्षामंत्री एके एंटोनी भी मानते है कि बेहतर वेतन व सुविधाएं नहीं मिलने की वजह से अधिकारी कॉपोरेट जगत की तरफ आकर्षित हो रहे है। उन्होंने छठे वेतन आयोग में सशस्त्र सेनाओं के लिए बेहतर वेतन पैकेज होने के संकेत दिए थे लेकिन
सेना के अफसर और जवान तो छठे वेतन आयोग की सिफारिशों से नाराज दिखे ही सेना के रिटायर अफसर भी इस सिफारिश से नाखुश दिखाई दिए। अधिकारियों की मानें तो सेना के लिए वेतन निर्धारित करने के लिए गठित वेतन आयोग में सेना को शामिल नहीं किया गया। ऐसे में किसी भी तरह की उम्मीद करना बेकार है। एयरकंडिशनरों में बैठ कर सेना की जमीनी हकीकत नहीं समझी जा सकती। आजादी के पहले से सेना सरहदों की रक्षा कर रही है। इसके बावजूद हर वेतन आयोग में उसकी अनदेखी होती रही है। इनका कहना है कि कॉमन पे स्केल सभी जवानों के लिए लागू होना चाहिए। वेतन आयोग ने1 जनवरी 2006 से पहले के भर्ती पीबीओआर के लिए इसे लागू नहीं किया है। वेतन आयोग ने जवानों के लिए एशोर्ड करिअर प्रोग्रेशन (एसीपी) 10 और 20 साल निर्धारित की है, जबकि सिपाही 17 साल की सर्विस के बाद रिटायर हो जाता है। रैंक पे को ग्रेड पे में शामिल नहीं किया गया, इससे अफसरों के लाभ ओर कम हो जाएंगे। मिल्ट्री सर्विस पे (एमएसपी) को वेतन में शामिल नहीं किया गया। ये सब कुछ लिखने का मेरा मकसद इतना ही है कि राष्ट्रपति ने जवानों की उन दिक्कतों को तो समझा जिनसे वे सीमा पर दो चार होते हैं लेकिन उन्हें और भारत सरकार को उनके बेहतर पैकेज की तलाश कोभी समझना होगा और कुछ ऐसा करना होगा जिससे सेना में उनके घटते रुझान को बढ़ाया जा सके।

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anil kumar verma

गुर्जरों पर भारी आरुषि

24 मई 2008
अगर किसी से आज ये पूछा जाए कि कल यानि शुक्रवार को हिन्दुस्तान में वो कौन सी खबरें थीं जो सुर्खियों में रहीं तो निसन्देह अपने जवाब में वो पहले नोएडा के आरुषि-हेमराज हत्याकांड का नाम लेगा उसके बाद राजस्थान में आरक्षण को लेकर गुर्जरों द्वारा एक बार फिर की गई हिंसा की बात करेगा। बात करें मीडिया की तो उसके लिए तो कल मानो दुनिया ही थम गई थी। शाम को जैसे ही नोएडा के चर्चित आरुषि-हेमराज दोहरे हत्याकांड का खुलासा हुआ पूरा मीडिया जगत उस खबर की कवरेज के लिए ठीक उसी तरह टूट पड़ा जैसे चींटों का झुंड किसी गुड़ के धेले पर टूट पड़ता है। इस खबर के चक्कर में अपने आत्मसम्मान के लिए सड़को पर खून बहाने को आतुर शासन के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले गुर्जरों की वो लड़ाई फीकी पड़ गई जिसमें 16 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। वाहनों में तोड़फोड़ और आगजनी के बीच कई मांओं की गोद सूनी हो गई। पुलिस के जवानों की पिटाई हुई, ट्रेनें रोक दी गईं बात कर्फ्यू तक जा पहुंची लेकिन बावजूद इसके मीडिया का ध्यान नोएडा पर ही केंद्रित रहा। बीते एक साल में गुर्जरों ने आरक्षण की इसी मांग को लेकर कई बार हंगामा किया और देश के दूसरे कई राज्य भी उनके इस आंदोलन की आंच में झुलसे। इससे पहले मई 2007 में जब गुर्जर समाज सड़कों पर उतरा था तो मीडिया जगत के लिए उससे बड़ी कोई खबर नहीं थी और हर तरफ गुर्जरों के ही आंदोलन की चर्चा थी। शायद इसलिए क्योंकि उस वक्त अपने अनैतिक संबंधों को छुपाने के लिए किसी बाप ने अपनी मासूम बेटी की गला रेतकर हत्या नहीं की थी, जैसा कि इस बार हुआ। नोएडा में हुए आरुषि हत्याकांड ने गुर्जरों के आंदोलन की आग को ठण्डा कर दिया। अखबारों का मुख्य पृष्ठ हो या फिर कोई न्यूज चैनल हर जगह एक ही चर्चा थी, एक बाप ने अपनी बेटी की इसलिए हत्या कर दी क्योंकि वो उसके अनैतिक संबंधों के बारे में जान गई थी और उसका विरोध करती थी। इस हत्याकांड में आरुषि के पिता का हाथ होने की बात ही वो खास बिन्दु था जिसके चलते ये घटना अहम हो गई। उस पर जब ये खुलासा हुआ कि ये ऑनर किंलिंग थी तो फिर मामले ने बहस का रुप ले लिया। ऐसा नहीं था कि किसी बाप ने पहली बार अपनी बेटी का कत्ल किया था और ऐसा भी नहीं था कि पहली बार किसी 14 साल की बच्ची की हत्या हुई थी लेकिन इससे पहले हुई उन घटनाओं पर ये घटना इसलिए भारी पड रही थी क्योंकि इस कत्ल के पीछे जो उद्देश्य था वो समाज की उस तस्वीर को पेश कर रहा था जो हद से ज्यादा विकृत हो चली है। एक बाप अपनी उस 14 साल की बेटी के सामने वो हरकतें कर रहा था जिसे उसके गुरुओं और किताबों ने अनैतिक की संज्ञा दे रखी थी। उम्र के उस दौर में जब आरुषि को सबसे ज्यादा अपने माता पिता के मार्गदर्शन की ज़रूरत थी ऐसे में घर के माहौल में घुले अनैतिक रिश्तों के ज़हर ने उसकी जिन्दगी को निगल लिया। इस घटना से जुडी सभी कड़ियों को जोड़ने पर एक ऐसे समाज का अक्स उभरता है जो खुद को आईना दिखाना पसंद नहीं करता। आरुषि कुछ ऐसा ही करती थी। अपने पिता द्वारा नैतिकता के उल्लंघन का विरोध उसे मौत के मुहाने तक ले गया। मेरे मुताबिक यही वो वजह थी जिसने गुर्जर आंदोलन की खबर को निगल लिया। आज आरुषि हत्याकांड से उबरकर मीडिया गुर्जरों पर भले ही फोकस करेगा लेकिन सच यही है कि एक तयशुदा ढांचे में जीने वाला समाज जब अपनी वर्जनाओं को टूटते देखता है तो जड़ हो जाता है और इसीलिए मीडिया ने गुर्जर आंदोलन को छोड़ आरूषि हत्याकांड को प्रमुखता दी और लोग टेलीविजन से चिपके नजर आए।

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anil kumar verma

गुरुवार, 22 मई 2008

दंगे और हिन्दुस्तान

23मई 2008
गुरूवार को देश में कांग्रेस के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार ने अपने चार साल पूरे कर लिए। खट्टे मीठे अनुभवों के बीच जहां गठबंधन को एक टीम के रूप में तो प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह को एक कुशल अर्थशास्त्री के रूप में और सोनियां गांधी को एक जननेता के रूप में पेश किया गया। इन चार सालों में सरकार ने रोज़गार गारंटी योजना, सूचना का अधिकार, किसानों के लिए 60 हज़ार करोड़ रुपए के कर्ज़ की माफ़ी की घोषणाएँ कर जनता के बीच छाप छोड़ने की कोशिश की तो सच्चर आयोग का गठन कर और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए उच्च शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण की कवायद छेड़कर उन्हें ये विश्वास दिलाने में मदद की कि वास्तव में कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ है। हालांकि परमाणु करार जैसे तमाम मुद्दों पर सरकार के सहयोगी वामदलों और विपक्ष के साथ उनका तालमेल गड़बड़ाता नजर आया और संप्रग सरकार को आलोचनाओं का सामना करना पड़ा लेकिन इसी बीच सरकार ने एक और अहम फैसला लेकर सत्ता के गलियारों में चर्चा का माहौल बना दिया है। सरकार ने साल 2002 में गुजरात में हुए दंगों के दौरान पीड़ित हुए परिवार के लोगों के लिए 3.32 अरब रुपए के मुआवजे की घोषणा की है। वित्तमंत्री पी. चिदंबरम ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि गुजरात दंगे में जिन 1,169 लोगों की जानें गई हैं उनके परिवारों को प्रति परिवार तीन लाख पचास हजार रुपये की दर से मुआवजा दिया जाएगा। इस तरह मुआवजे के तौर पर कुल 40.19 करोड़ रुपये की राशि का वितरण किया जाएगा। उल्लेखनीय है कि गोधरा रेलवे स्टेशन के निकट साबरमती एक्सप्रेस में एक हिंसक भीड़ द्वारा 59 हिंदुओं को जलाकर मार देने के बाद गुजरात में साम्प्रदायिक दंगे भड़क उठे थे। इन दंगों में एक हजार से अधिक लोग मारे गए थे। छह साल के बाद सरकार के इस कदम ने राजनीतिक विश्लेषकों को अपना दिमाग चलाने के लिए मजबूर कर दिया है। आने वाले समय में मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, और नई दिल्ली समेत देश के तमाम राज्यों में चुनाव तो होने ही हैं साथ ही लोकसभा चुनावों की आहट भी सुनाई दे रही है। ऐसे में पहली नजर में यूपीए सरकार द्वारा गुजरात दंगा पीड़ितों के लिए की गई राह्त पैकेज की घोषणा महज चुनावी द्रष्टिकोण से उठाय़ा गया कदम ही लगता है। हालांकि ये कहना अभी जल्दबाजी होगी कि इस फैसले के चलते उसे बड़ा राजनीतिक लाभ मिलने जा रहा है क्योंकि गुजरात विधानसभा चुनाव में मोदी सरकार की खिलाफत में बजाया गया इसी दंगे का बिगुल कोई गुल नहीं खिला सका था। मोदी मंत्र फिर चला था और कमल निखरकर खिला था। बहरहाल ये तो हो गया राजनीतिक द्रष्टिकोण, बात करें गुजरात दंगे में मारे गए उन परिवारों की तो इस घोषणा के बाद देर से ही सही उनके ज़ख्मों पर मरहम ज़रूर लगेगा। बात गुजरात दंगे की चली है तो मैं यहा ये सवाल भी उठाना चाहूंगा कि आखिर हम धर्म और मजहब के नाम पर आपस में उलझकर राजनीतिक दलों को ये मौका कब तक देते रहेंगे कि वो हमारी और हमारे प्रियजनों की लाशों पर अपने फायदे की रोटियां सेंक सकें। सांप्रदायिक तनाव की स्थिति आज भी देश में सर्वाधिक चिंतनीय है। देश में संप्रदाय के नाम पर लोगों को आपस में खूब लड़ाया जाता है। राजनैतिक दल एवं राजनेता स्वयं जातिवाद या सांप्रदायवाद के प्रतीक बन गए हैं। आज हर वर्ष देश के कुछ भागों में सांप्रदायिक दंगे का भड़क जाना और सैकड़ों बेगुनाहों का खून बह जाना, सामान्य बात हो गई है। आखिर हम कबीर दास जी की इन पंक्तियों को अपने जीवन में कब उतारेंगे कि-

काशी-काबा एक है,एकै राम-रहीम।
मैदा एक पकवान बहु,बैठ कबीरा जीम॥


आप सोच रहे होंगे राजनीति की बात करते करते ये अचानक मेरा लहजा उपदेशात्मक क्यों और कैसे हो गया। दरअसल राजनीतिक नजरिए से बात को इसलिए शुरू किया क्योंकि दंगों की बात लिखते, सुनते और कहते हुए भी डर लगता है। बहाना मिला तो कह रहा हूं क्योंकि देश में हालात अभी भी बहुंत अच्छे नहीं है। इंसानियत के दुश्मन अपना नापाक मंसूबों की कामयाबी के लिए मौके ढूंढ रहे हैं और हमारी सोच उन्हें अवसर भी दे रही है। हालात ऐसे हैं कि अब तो मौत को भी इन दंगाइयों से डर लगने लगा होगा। यहां किसी कवि की ये कविता कहना चाहूंगा -

शहर में दंगा और दंगे के बाद कर्फ्यू
स्थिति तनावपूर्ण लेकिन नियंत्रण में
कुछ कुछ ऐसा ही था समाचारों में
सुबह के सात बज गए थे
अखबार वाला भी आया नहीं
तभी किसी के पदचापों का स्वर
और फिर खटखट की आवाज
सोचा चलो अखबार तो आया
लेकिन दरवाजों पर उभरी आकृति ने
मुझको चौंकाया
वह नारी थी
सांस उसकी इतनी तेज कि
जैसे उसे किसी ने दूर तक भगाया हो
मैं सोच ही रहा था कि कौन है ये
पहले ही वह बोल उठी मैं
मैं हूं मौत, हां मौत
मैं चीखा मौत
भाग जाओ यहां से
अब तक तूने कितने ही
निर्दोषों का खून पिया है
अब मुझे लेने आई है
पर वह क्षमा याचना स्वर में बोली
तुम बचा लो
मुझे डर लग रहा है
डर, हा-हा-हा मैं हंसा और बोला
क्या मौत को भी डर लगता है
किससे
जवाब था हां,
दंगाइयों और कर्फ्यू से....
ये लिखने का मेरा मकसद यही है कि अब भी वक्त है हमें सचेतना होगा और अपने अतीत से सीखकर वर्तमान को संभालना होगा। तभी एक विकसित और खुशहाल हिन्दुस्तान बने सकेगा।

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anil kumar verma

हाल-ए-नोएडा

22मई 2008

दिल्ली से सटा उत्तर प्रदेश का जिला गौतमबुद्दनगर यानि नोएडा किसी परिचय का मोहताज नहीं है। 203 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले पांच लाख की आबादी वाले इस जिले में कारोबार की अपार संभावनाएं युवाओं से लेकर हर वर्ग के लोगों को अपनी ओर खींच रहा है। बात रिहाइश की हो यो फिर रोजगार की राजधानी दिल्ली को भी ये शहर मात देता नजर आ रहा है लेकिन इन अच्छाइयों के साथ साथ इस शहर में कुछ बुराइयां भी पल रही है। मैं सभी तो नहीं हां कानून व्यवस्था की बात ज़रूर करूंगा। नोएडा का निठारी कांड हो या फिर भूमि आंबटन घोटाला, अनंत आपहरण कांड हो या फिर आए दिन ब्लू लाइन के पहियों तले कुचले जाते लोगों की व्यथा ये शहर अखबारों से लेकर इलेक्ट्रानिक मीडिया तक के लिए खास तवज्जो का केंद्र रहा है। इधर बीते कुछ महीनों से सपनों के इस शहर में हत्याओ का सिलसिला सा चल पड़ा है। बीती 18 मार्च को हुई स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया के एक वरिष्ठ अधिकारी की हत्या के बाद आजकल नोएडा सेक्टर 25 में हुए दोहरे हत्याकाण्ड को लेकर एक बार फिर से चर्चा में है। डीपीएस की कक्षा नौ की छात्रा आऱुषि तलवार और उसके नौकर हेमराज की हत्या पुलिस के लिए जहां एक चुनौती बनकर सामने खड़ी है वहीं प्रदेश सरकार भी इस मामले को लेकर सवालों के कठघरे में खड़ी नजर आ रही है। घटना की सूचना के बाद मौके पर पहुंची पुलिस अपनी कार्यशैली को लेकर मीडिया के निशाने पर रही। लापरवाही के आरोप में जिले के पुलिस कप्तान और इलाके के थानाध्यक्ष के तबादले तक कर दिए गए लेकिन बावजूद इसके अभी तक हत्यारे पुलिस की गिरफ्त से दूर हैं। अब नोएडा पुलिस ने इस हत्याकांड के खुलासे में मदद के लिए दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच से संपर्क साधा है। उधर इस हत्याकांड के बाद मुख्यमंत्री मायावती एक बार जिले का दौरा भी कर गईं लेकिन उन्होंने तो इस मामले पर कुछ बोलने से ही मना कर दिया। हालांकि उन्होंने जन समस्याओं के निराकरण के लिए अधिकारियों की क्लास ज़रूर लगाई लेकिन कानून व्यवस्था को लेकर फिलहाल उन्होंने कुछ भी नहीं कहा। उनके इस बर्ताव पर मुझे तो किसी कवि द्वारा कही गई ये पंक्तियां एकदम सटीक लगती हैं-

तुम्हारे शहर में कुछ भी हुआ नहीं है क्या
कि तुमने चीखों को सचमुच सुना नहीं है क्या
मैं इक ज़माने से हैरान हूँ कि हाकिम-ए-शहर
जो हो रहा है उसे देखता नहीं है क्या


हालांकि नोएडा एक और वजह से खासा चर्चा में है और वो है यहां लगातार ज़मीनों की कीमत मे लगातार हो रही बढोतरी। नोएडा विकास प्राधिकरण ने जमीन के दामों में 70 से 80 फीसदी का अप्रत्याशित इजाफा किया है। ग्रेटर नोएडा में आवासीय भूखंडो की दरों को 5900 रुपये से बढ़ाकर 10,500 रुपये प्रति वर्ग मीटर,संस्थागत श्रेणी के भूंखडों के दाम 2800 रुपये से बढ़ाकर 6000 रुपये प्रति वर्ग मीटर और कामर्शियल श्रेणी में 12,000 रुपये से 20,000 रुपये प्रति वर्ग मीटर कर दिये गये है। कह सकते हैं कि अब नोएडा में आम आदमी के लिए मकान खरीदने का सपना भी हाथी पालने के बराबर हो गया है। बदहाल कानून व्यवस्था और आसमान छूती ज़मीन की कीमतों के साथ साथ पीने के पानी की समस्या और बिजली की आंख मिचौली के बीच लोग अपने सपनों में हकीकत का रंग भरने के लिए इस शहर की और दौडे चले आ रहे हैं।

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anil kumar verma

बुधवार, 21 मई 2008

सपनों की हकीकत

21मई 2008
विदेशों में नौकरी दिलाने के नाम पर कबूतरबाजों ने गाजियाबाद में छह लोगों को छह लाख अस्सी हजार रुपए का चूना लागाया और फरार हो गए। एक हिन्दी अखबार में छपी ये खबर कोई नयी नहीं है। इस तरह के सैकड़ों मामले पहले भी प्रकाश में आए हैं। पूरे देश में इस तरह के तमाम नेटवर्क काम कर रहे हैं जो लोगों का दूसरे मुल्कों के प्रति बढ़ते रुझान और बढ़ती बेरोजगारी
का फायदा उठाकर लोगों को ठग रहे हैं। ये तो वो लोग हैं जो विदेश पहुंचने से पहले ही ठगी का शिकार हो गए लेकिन तमाम ऐसे लोग भी हैं जिन्हें असलियत का पता उस वक्त चला जब उन्होंने अपने वतन से हजारों किलोमीटर दूर अनजाने मुल्क में कदम रखा। भारत के तमाम राज्यों से बड़ी तादात में लोग नौकरी या रोजगार के नाम पर दूसरे मुल्को का रुख कर रहे हैं। ये लोग विदेश जाने के लिए ट्रेवेल एजेंटों का सहारा लेते हैं लेकिन इनमें से ज्यादातर एजेंट फर्जी होते हैं। दरअसल विदेशी मुल्कों का रुख करने के पीछे कुछ तो लोगों की बुनियादी ज़रूरतें हैं और कुछ आकर्षण। ऐसे लोगों में ग्रामीण परिवेश में रहने वालों की संख्या ज्यादा होती है। ये लोग जीवन में कुछ बेहतरीन हासिल करने के लिए मन में ठाठें मार रही ख्वाहिशों को हकीकत का जामा पहनाने के लिए पराए मुल्क का रुख करते हैं। हालांकि इनके दिलों में आसमान साध लेने की ललक नहीं होती ये लोग अपने परिवार के लिए दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करने के लिए ही अपनों से दूर जाते हैं। इनसे इनका घर बार छूटता है, अपनों का प्यार छूटता है, गांव की वो गलियां छूटती हैं जिनमें उनका बचपन बीता है, छूट जाते हैं वो त्योहार जिनकी रूमानियत उनके रोम रोम में बसी है, छूट जाती है वो हवा जिसकी खुश्बू उनकी सांसों को महकाती है साथ ही छूट जाती है वो मिट्टी जिसकी गोद में खेलकर वो बड़े हुए हैं लेकिन क्या करें इन सब पर उनकी जरूरतों की मार भारी पड़ती है। बच्चों को पढ़ाना है, मां बाप का इलाज कराना है, बरसात में टपकती कच्ची छत को पक्का करवाना है, साहूकार का कर्ज चुकाना है ऐसी तमाम उलझनें सुलझाने के लिए लोग विदेशों का रुख करते हैं। ऐशो-आराम उनका मकसद नही होता, मकसद होता है परिवार का सुकून। हालांकि सभी को ये हासिल हो ऐसा ज़रूरी भी नहीं। कबूतरबाजों के चक्कर में अपना सब कुछ गिरवी रखकर पराए मुल्क पहुंचे भोले भाले लोगों को कागजी कार्रवाई के जाल में उलझकर तमाम मुसीबतों का भी समाना करना पड़ता है। परेशानी कभी फर्जी पासपोर्ट और वीजे के रूप में सामने आती है तो कभी कोई और रुप धरकर। सब सहते हैं परिवार की खातिर। बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, सउदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे तमाम देशों में भारतीय पुरुष और महिलाएं अपना पसीना बहा रहे हैं। इनको यहां मिला रोजगार शारीरिक शोषण और दूसरे अमानवीय जुल्मों का पर्याय बन जाता है लेकिन क्या करें अपने परिवार के लिए सब सहते हैं। आंकड़े बताते हैं कि 2006 में इन देशों से भारत भेजी गई कुल रकम 235 करोड़ रुपए थी। यही वजह रहती है कि सब सहकर भी लोग चुप रहते हैं। कभी कभी तो बीमार होने पर समय पर कंपनियां इन्हें उचित इलाज तक नहीं देती जिसके अभाव में इनकी मौत तक हो जाती है। इतना ही नहीं इसकी सूचना तक संबंधित परिवार तक नहीं पहुंचाई जाती है। अपने आखिरी समय में अपने परिजनों से मिलने की ललक दिल में लिए इस तरह के तमाम लोग इस दुनिया से विदा ले लेते हैं। महीनों बाद घर वालों को सूचना मिलती है कि उनके घर का चिराग हमेशा के लिए बुझ गया। किसी को समय से पता भी चल गया तो सरकारी दफ्तरों और दूतावास के चक्कर लगाते लगाते उनकी एडियां घिस जाती है लेकिन लाश क्लेम नहीं हो पाती। ऐसे तमाम उदहाऱण देखने को मिले हैं जब पराए मुल्क में नौकरी के लिए गए लोगों की मौत के बाद उनका शरीर अंतिम दर्शनों के लिए उनके परिजनों को नसीब नहीं हुआ। हालांकि खाड़ी देशों में अब ऐसे लोगों के लिए सुधारात्मक उपाय अपनाने की पहल की जा रही हैं। इनसके तहत भारतीयें के लिए काम करने के हालात सुधारने की पहल की जा रही है। इसके पीछे बड़ी वजह है भारत का नई आर्थिक शक्ति के रूप में उभरना लेकिन फिलहाल इसमें काफी वक्त लग सकता है। फिलहाल तो गरीबी और बेरोजगारी भारतीयों को विदेशों का रुख करने के लिए मजबूर कर रही है और ये लोग कभी कबूतरबाजों का शिकार बन रहे हैं तो कभी पराए मुल्क पहुंचकर शारीरिक शोषण झेल रहे हैं। भारत से ही शुरू हई शोषण की कहानी जब तक इन लोगों की समझ में आती है तब तक इनकी जिन्दगी दूसरों की दया की मोहताज हो चुकी होती है। ये सिलसिला शायद चलता रहे क्योंकि इस देश से न तो गरीबी मिटने वाली है औऱ नही बेरोजगारी। सच्चाई कड़वी है लेकिन यही है।

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anil kumar verma

सोमवार, 19 मई 2008

बेबस बुंदेलखण्ड

19 मई 2008
सूखे और दरारों से भरे खेत, आसमान में टकटकी लगाए बूढी और कमजोर आंखें, शरीर के नाम पर हड्डियों का ढांचा लिए भूख से बिलबिलाते बच्चे, सूनी मांग लिए विधवाओं की एक बड़ी संख्या, सूखे तालाब और नदियां, सन्नाटे को भी शर्मसार कर देने वाली वीरानी समेटे गांव और उन गांवों के घरों में पड़े ताले, किसी उपन्यासकार के लिए कहानी की एक अच्छी पृष्ठभूमि साबित हो सकते हैं और हुए भी हैं। कहानियां लिखी जा रही हैं, लेख लिखे जा रहे हैं, ब्लाग्स पर विचारों को शब्दों की चाशनी में ढाला जा रहा है। फिल्में बन भी चुकी हैं और हो सकता है किसी फिल्मकार का दिल एक बार फिर इन हालातों को सिने जगत की सिल्वर स्क्रीन पर दिखाने के लिए मचल जाए लेकिन जरा उन दिलों से पूछिए जो वास्तव में इस तस्वीर का एक हिस्सा हैं। जी हां, ऊपर जिन दृश्यों को मैनें शब्दों का मुलम्मा पहनाया वो वास्तव में बुंदेलखण्ड की तस्वीर का एक जीता जागता उदाहरण भर हैं। उदाहरण इसलिए कह रहा हूं क्योंकि हकीकत इससे कहीं ज्यादा भयावह है। अपने अतीत की चादर में एक गौरवशाली इतिहास समेटे उत्तर प्रदेश का ये इलाका पिछले पांच सालों से सूखा, भूख और बेकारी के साथ साथ कर्ज के मकड़जाल की उस दास्तान से रूबरू हो रहा है जिसने इसकी समृद्धशाली तस्वीर को बदरंग कर दिया है। अन्नदाता के नाम से मशहूर किसानों से इंद्र देवता क्या रूठे गरीबी ने इनके घरों में स्थाई ठिकाना बना लिया। खेत बंजर हो गए तो बात कर्जे तक जा पहुंची। गांव के साहूकार ने गहनों और ज़मीनों को गिरवी रखकर कर्ज दिया तो बैकों ने क्रेडिट कार्ड का झुनझुना थमाया लेकिन हालात न बदलने थे न बदले। सूखे ने साथ नहीं छोड़ा, कर्जे पर ब्याज बढ़ गया तो कर्ज चुकाने के लिए फिर कर्ज लिया। फिर तो जैसे सिलसिला सा चल पड़ा और सिलसिले की भेंट चढ़ने लगी अन्नदाताओ की जिंदगी। सूखे और कर्ज से परेशान किसान एक एक कर आत्महत्या करने लगे। भूख, बेकारी और तंगहाली ने इन किसानों के घरों में डेरा डाल दिया था। ये तीनों तो घर से निकले नहीं लिहाजा घर के दूसरे मर्दों ने कामकाज की तलाश में गांव छोड़ना शुरू कर दिया। इसका अंदाजा आपको तब होगा जब आप महोबा रेलवे स्टेशन पर पहुंचेगे और आपको पता चलेगा कि पिछले कुछ महीनों में वहां से डेढ़ लाख टिकट बिके, जिनमें से ज्यादातर दिल्ली के थे। कुछ ऐसा ही हाल झांसी और उरई का है। लगभग डेढ़ लाख किसान हर महीने इस इलाके से पलायन कर रहे हैं। कर्ज के मकड़जाल और भूख की तपिश से होने वाली मौतों को पहले तो स्थानीय प्रशासन अपनी गरदन नपने के डर से दबाए रहा लेकिन जब इन इलाकों में काम करने वाली स्वयंसेवी संस्थाओं ने हो हल्ला मचाया तो बात दूर तक फैली। वातानुकूलित कमरों में बैठकर ऐसे लोगों की सरपरस्ती का दम भरने वाले खद्दरधारियों के कानों पर भी सिलवटें दिखीं और वो हरकत में आ गए। फिर शुरू हुआ एक दूसरे को कोसने का सिलसिला। राज्य सरकार ने केंद्र को कोसा और केंद्र ने हालातों के लिए राज्य को जिम्मेदार ठहराया। इतने से तसल्ली नहीं हुई तो ताबड़तोड़ दौरे शुरू हो गए। प्रदेश में नई पारी खेलने को तैयार बैठी कांग्रेस को भी अवसर मुफीद लगा तो युवराज राहुल गांधी भी बुंदेलखण्ड का दर्द जानने के लिए मचल उठे। जब राहुल बांदा से 20 किलोमीटर दूर बसे पंडुई गांव पहुंचे तो वहां के लोगों में अपना दर्द बयां करने की होड़ सी लग गई। थरथराती काया के मुंह से जब बोल फूटे तो आँखों से आंसुओं की अविरल धारा बह निकली। इसी गांव से सटी एक दलित बस्ती में रहने वाली बच्ची प्रभा से जब कुरेद कर पूछा गया तो उसने कहा कि रोज रोज खाने को नहीं मिलता। अम्मा चूल्हे की राख गरम पानी में घोलकर कपड़े से छान देती है। आज पूरा दिन वही पीकर गुजारा है। हालात इतने भयावह थे कि राहुल खुद भावुक हो गए। हर दिल से एक ही आवाज आ रही थी कि साहब हमका बचाए लियो नाहीं त हम भूखय मर जाबै। राहुल सभी को राहत का भरोसा दिलाकर गए और केंद्र सरकार ने इस बार के बजट में किसानों को राहत देते हुए सोलह हजार करोड़ के कर्ज माफ कर दिए। बावजूद इसके भी हालात नहीं सुधरे हैं। बुंदेलखण्ड को लेकर यूं तो राजनीति पहले भी होती रही है लेकिन राहुल के दौरे के बाद इसमें कुछ ज्यादा ही तेजी आ गई। मुख्यमंत्री मायावती को लगा कि राहुल तो बाजी मार ले जायेंगे लिहाजा उन्होंने बुंदेलखण्ड को अलग राज्य बनाने की मांग करते हुए केंद्र से अस्सी हजार करोड़ के पैकेज की मांग कर डाली। दूसरे राजनीतिक दल भी अपने स्तर से बुंदेलखण्ड के नाम पर कुछ न कुछ खिचड़ी पका रहे हैं लेकिन सवाल यही है कि ये सारी कवायद महज राजनीतिक शोशा भर है। बुंदेलखण्ड में आज भी कर्ज वसूली के नाम पर खेत बंधक बनाए जा रहे हैं। सिकरी व्यास गांव में तो पूरे गांव की जमीन गिरवी पड़ी है। सौ-सौ बीघे खेतों के काश्तकार शहरों में जाकर चौकीदारी कर रहे हैं। क्या करें खेतों की कोख बंजर हो चुकी है। भूख, भुखमरी, खुदकुशी और पलायन यही बुंदेलखण्ड की नियति बन चुकी है और हमारे देश की राजनीति और नेता इसी नियति पर अपने चूल्हे की रोटी सेंक रहे हैं और संकते रहेंगे भले ही हमारा अन्नदाता भूख से बिलबिला कर दम तोड़ दे।

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anil kumar verma
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